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प्रोजेक्ट-75I के तहत भारतीय नौसेना को मिलेंगी 6 AIP पनडुब्बियां, जर्मनी की मदद से भारत में बनेंगी चीन-पाकिस्तान का मुकाबला करने वाली सबमरीन

Written by:Shyam Dwivedi
Published:
भारतीय नौसेना अपने बेड़े को मजबूत करने के लिए प्रोजेक्ट-75I के तहत 6 अत्याधुनिक पनडुब्बियां शामिल करने जा रही है। जर्मनी की मदद से इन AIP-तकनीक वाली पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा, जिसका मुख्य उद्देश्य हिंद महासागर में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती चुनौती का मुकाबला करना है।
प्रोजेक्ट-75I के तहत भारतीय नौसेना को मिलेंगी 6 AIP पनडुब्बियां, जर्मनी की मदद से भारत में बनेंगी चीन-पाकिस्तान का मुकाबला करने वाली सबमरीन

नई दिल्ली: हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान की बढ़ती नौसैनिक गतिविधियों के बीच भारत अपनी समुद्री ताकत को एक नई ऊंचाई पर ले जाने की तैयारी में है। प्रोजेक्ट-75I के तहत भारतीय नौसेना के लिए 6 अत्याधुनिक पारंपरिक पनडुब्बियों के निर्माण की प्रक्रिया अंतिम चरण में है। सूत्रों के मुताबिक, इस दौड़ में जर्मनी की टाइप-214एनजी पनडुब्बी ने स्पेन की S-80 प्लस को पीछे छोड़ दिया है और जल्द ही इस पर अंतिम मुहर लग सकती है।

यह परियोजना सिर्फ पनडुब्बी खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह ‘मेक इन इंडिया’ और रणनीतिक आत्मनिर्भरता की दिशा में एक बड़ा मील का पत्थर साबित होगी। इन सभी 6 पनडुब्बियों का निर्माण भारत में ही किया जाएगा।

क्यों खास हैं ये जर्मन पनडुब्बियां?

जर्मनी की पनडुब्बी को प्राथमिकता देने की सबसे बड़ी वजह इसकी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन यानी AIP तकनीक है। यह एक फ्यूल-सेल आधारित सिस्टम है जो परखा हुआ और भरोसेमंद माना जाता है। AIP तकनीक पनडुब्बियों को हफ्तों तक पानी के नीचे रहने की क्षमता देती है, जिससे उनकी दुश्मन की नजरों से छिपे रहने की यानी स्टेल्थ क्षमता कई गुना बढ़ जाती है। इसके अलावा, बेहतर साइलेंस तकनीक और कम तकनीकी जोखिम भी इसके पक्ष में जाते हैं। समंदर के नीचे होने वाली जंग में कम शोर और भरोसेमंद तकनीक सबसे अहम होती है।

भारत में निर्माण, 60% तक स्वदेशी सामग्री का लक्ष्य

इस प्रोजेक्ट की एक और बड़ी खासियत यह है कि इसका निर्माण पूरी तरह से भारत में होगा। मुंबई स्थित मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड (MDL) में इन पनडुब्बियों को बनाया जाएगा, जबकि जर्मनी की कंपनी थायसेनक्रुप मरीन सिस्टम्स (TKMS) तकनीकी सहायता और डिजाइन मुहैया कराएगी।

सरकार का लक्ष्य सिर्फ हथियार खरीदना नहीं, बल्कि तकनीक हासिल करना भी है। शुरुआत में इन पनडुब्बियों में लगभग 45 फीसदी स्वदेशी सामग्री का इस्तेमाल होगा। इस लक्ष्य को आखिरी पनडुब्बी के निर्माण तक करीब 60 फीसदी तक ले जाने की योजना है। इससे भविष्य में भारत को पूरी तरह से स्वदेशी पनडुब्बियां डिजाइन और विकसित करने में मदद मिलेगी।

हिंद महासागर में बढ़ती चुनौती का जवाब

प्रोजेक्ट-75I की अहमियत इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि भारत की मौजूदा पारंपरिक पनडुब्बियों का बेड़ा पुराना हो रहा है। वहीं दूसरी ओर, हिंद महासागर में चीन की परमाणु पनडुब्बियों की मौजूदगी और पाकिस्तान को चीन से मिल रही आधुनिक पनडुब्बियां भारत के लिए एक बड़ी रणनीतिक चुनौती पेश कर रही हैं।

ये नई पनडुब्बियां समुद्री चोक-पॉइंट्स की निगरानी करने, दुश्मन की पनडुब्बियों पर नजर रखने और जरूरत पड़ने पर दुश्मन की सप्लाई लाइन को बाधित करने जैसे अभियानों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। सूत्रों के अनुसार, प्रोजेक्ट-75I पर बातचीत सितंबर 2025 में तेज हुई थी और आने वाले कुछ महीनों में इसे अंतिम रूप दिए जाने की उम्मीद है। यह भारत-जर्मनी के बीच एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी का भी प्रतीक है, जो भविष्य में रक्षा तकनीक के क्षेत्र में नए रास्ते खोल सकता है।