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लोकसभा में सोमवार को स्पीकर ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा, BJP-कांग्रेस ने जारी किया व्हिप

Written by:Ankita Chourdia
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बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत के साथ लोकसभा में सोमवार को अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने का प्रस्ताव सूचीबद्ध है। इस पर संभावित टकराव को देखते हुए BJP और कांग्रेस, दोनों ने अपने सांसदों को सदन में मौजूद रहने का व्हिप जारी किया है। विपक्ष ने नोटिस में आरोप लगाया है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर चर्चा के दौरान राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं को पर्याप्त समय नहीं दिया गया।
लोकसभा में सोमवार को स्पीकर ओम बिरला को हटाने के प्रस्ताव पर चर्चा, BJP-कांग्रेस ने जारी किया व्हिप

संसद के बजट सत्र के दूसरे चरण की शुरुआत के साथ ही लोकसभा में सोमवार का दिन राजनीतिक रूप से अहम माना जा रहा है। सदन की कार्यसूची में लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पद से हटाने से जुड़ा विपक्ष का प्रस्ताव शामिल किया गया है। इस मुद्दे पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने संख्या बल को लेकर तैयारी तेज कर दी है, और इसी वजह से BJP तथा कांग्रेस ने अपने-अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी किया है ताकि मतदान या चर्चा के समय उपस्थिति सुनिश्चित रहे।

यह नोटिस विपक्षी दलों ने बजट सत्र के पहले चरण के दौरान दिया था। अब इसे औपचारिक रूप से सदन में लिए जाने के साथ प्रक्रिया संवैधानिक मोड़ पर पहुंचती दिख रही है। संसदीय नियमों के तहत जब अध्यक्ष के खिलाफ हटाने का प्रस्ताव चर्चा के लिए आता है, तब अध्यक्ष खुद सदन की कार्यवाही की अध्यक्षता नहीं करते। इस चरण में वे सदन में सदस्य के रूप में बैठ सकते हैं और प्रस्ताव के खिलाफ अपना पक्ष भी रख सकते हैं।

विपक्ष के आरोप और नोटिस का आधार

विपक्षी दलों ने अपने नोटिस में मुख्य आरोप यह रखा है कि राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव की चर्चा के दौरान नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं को पर्याप्त समय नहीं दिया गया। विपक्ष का कहना है कि कार्य संचालन में खुलकर भेदभाव हुआ। इसी आरोप को आधार बनाकर अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव लाने की पहल की गई। राजनीतिक रूप से यह मुद्दा इसलिए भी बड़ा है क्योंकि चर्चा महज प्रक्रिया तक सीमित नहीं रह सकती, बल्कि सदन के संचालन की निष्पक्षता पर व्यापक बहस में बदल सकती है।

सूत्रों के मुताबिक, कम से कम 118 विपक्षी सांसदों ने इस प्रस्ताव के नोटिस का समर्थन किया था। यह नोटिस कांग्रेस सांसद और पार्टी के मुख्य सचेतक के सुरेश ने कांग्रेस, समाजवादी पार्टी और DMK समेत कई विपक्षी दलों की ओर से लोकसभा सचिवालय को सौंपा। जानकारी के अनुसार TMC के सांसदों ने इस नोटिस पर हस्ताक्षर नहीं किए। यानी विपक्ष के भीतर भी इस प्रस्ताव पर एकसमान रणनीति नहीं दिखी, हालांकि औपचारिक चुनौती दर्ज कराने के लिए जरूरी समर्थन संख्या मौजूद रही।

चर्चा के दिन अध्यक्ष की भूमिका और मतदान की तकनीकी प्रक्रिया

संवैधानिक प्रावधानों के अनुसार, अध्यक्ष के खिलाफ प्रस्ताव आने पर वे पीठासीन नहीं हो सकते। संसदीय परंपरा में इस स्थिति को संवेदनशील माना जाता है, क्योंकि एक तरफ अध्यक्ष का संस्थागत पद होता है, दूसरी तरफ उन्हें अपने बचाव का अधिकार भी मिलता है। सूत्रों के अनुसार, जिस दिन नोटिस सौंपा गया था उसी दिन से ओम बिरला ने नैतिक आधार पर सदन की अध्यक्षता करना बंद कर दिया था, जबकि नियमों के मुताबिक वे प्रस्ताव पेश होने तक कुर्सी संभाल सकते थे।

संविधान विशेषज्ञ पीडीटी आचार्य के मुताबिक, अध्यक्ष को प्रस्ताव पर अपनी बात रखने का अधिकार है और वे मतदान भी कर सकते हैं। हालांकि, इस स्थिति में वे स्वचालित मतदान प्रणाली के जरिए वोट दर्ज नहीं करेंगे। उन्हें अलग से पर्ची भरकर अपना मत देना होगा। संसदीय तकनीक का यह पहलू अक्सर कम चर्चा में आता है, लेकिन ऐसे प्रस्तावों में प्रक्रिया की वैधता और रिकॉर्ड की पारदर्शिता के लिहाज से यह बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

सोमवार की कार्यवाही इसलिए भी उल्लेखनीय रहेगी क्योंकि यह केवल आरोप-प्रत्यारोप का राजनीतिक मंच नहीं होगी, बल्कि नियम, परंपरा और संख्या तीनों का परीक्षण करेगी। यदि लंबी चर्चा होती है तो दोनों पक्ष अपने-अपने दावों को रिकॉर्ड में लाने की कोशिश करेंगे। सत्ता पक्ष अध्यक्ष के आचरण और प्रक्रियागत निर्णयों का बचाव करेगा, जबकि विपक्ष समय आवंटन और विपक्षी आवाजों के प्रतिनिधित्व को केंद्र में रखेगा।

हटाने के प्रस्ताव का संवैधानिक ढांचा क्या कहता है

लोकसभा अध्यक्ष को हटाने का प्रावधान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 94 और अनुच्छेद 96 में दिया गया है। ऐसे प्रस्ताव को पारित कराने के लिए साधारण बहुमत की जरूरत होती है, लेकिन यहां बहुमत की गणना सिर्फ उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों से नहीं, बल्कि सदन की प्रभावी सदस्य संख्या के संदर्भ में देखी जाती है। इसलिए इस तरह के प्रस्ताव में अनुपस्थित सदस्य भी राजनीतिक समीकरण पर असर डालते हैं, और व्हिप जारी करने का महत्व काफी बढ़ जाता है।

प्रक्रियागत रूप से प्रस्ताव लाने के लिए कम से कम दो सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी होते हैं, हालांकि अधिक सदस्य भी समर्थन में हस्ताक्षर कर सकते हैं। नोटिस लोकसभा महासचिव को दिया जाता है। इसके बाद प्रारंभिक जांच होती है कि आरोप स्पष्ट और विशिष्ट हैं या नहीं। जांच पूरी होने के बाद प्रस्ताव को 14 दिन के अंतराल के बाद सदन में लिया जा सकता है। मौजूदा मामले में यही क्रम अपनाया गया और अब प्रस्ताव चर्चा के चरण तक पहुंचा है।

लोकसभा के इतिहास में अध्यक्ष के खिलाफ ऐसे प्रस्ताव पहले भी लाए गए थे, लेकिन अब तक कोई प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। अतीत में जीवी मावलंकर, हुकुम सिंह और बलराम जाखड़ जैसे अध्यक्षों को भी इस तरह की चुनौती का सामना करना पड़ा था, हालांकि वे प्रस्ताव अंततः खारिज हो गए। मौजूदा प्रस्ताव का राजनीतिक परिणाम जो भी हो, सोमवार की बहस संसदीय आचरण, विपक्ष के अधिकारों और सदन संचालन की निष्पक्षता पर एक महत्वपूर्ण संदर्भ बिंदु बन सकती है।

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