आज राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि है। प्रधानमंत्री मोदी ने श्रद्धांजलि देते हुए उन्हें आत्मनिर्भर भारत के संकल्प का आधारस्तंभ बताया है। उन्होंने कहा है कि ‘राष्ट्रपिता महात्मा गांधी को उनकी पुण्यतिथि पर मेरा शत-शत नमन। पूज्य बापू का हमेशा स्वदेशी पर बल रहा, जो विकसित और आत्मनिर्भर भारत के हमारे संकल्प का भी आधारस्तंभ है। उनका व्यक्तित्व और कृतित्व देशवासियों को कर्तव्य पथ पर चलने के लिए सदैव प्रेरित करता रहेगा।’
1948 में इसी दिन दिल्ली के बिड़ला हाउस में प्रार्थना सभा के दौरान नाथूराम गोडसे ने महात्मा गांधी पर तीन गोलियां दागी थीं। उस दिन गांधीजी अपनी रोज़ाना की शाम प्रार्थना सभा के लिए बिड़ला हाउस के प्रांगण में जा रहे थे। वे हाल ही में किए गए उपवास के कारण थोड़े कमजोर थे। उनकी दो पोतियां मनु और आभा उन्हें सहारा दे रही थीं। गांधीजी धीरे-धीरे सीढ़ियां चढ़कर प्रार्थना स्थल की ओर बढ़ रहे थे जहां सैकड़ों लोग इंतजार कर रहे थे। तभी भीड़ में से नाथूराम गोडसे आगे आया..उसने हाथ जोड़कर प्रणाम किया फिर अपनी जेब में छिपाई हुई पिस्तौल निकाली और महात्मा गांधी पर तीन गोलियां दाग दी। ‘हे राम’ कहते हुए बापू ने अंतिम सांस ली थी। उनकी हत्या ने पूरे देश को गहरे सदमे में डाल दिया थ। तब से यह तारीख सत्य, अहिंसा, शांति और बलिदान के रूप में स्मरण की जाती है।
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि
राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पुण्यतिथि पर देशभर ने उन्हें श्रद्धांजलि दी जा रही है। लेकिन यह दिन सिर्फ उन्हें स्मरण करने का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का भी है। खासकर ऐसे समय में जब दुनिया युद्ध के हालात, बढ़ती हिंसा, वैमनस्य और जातिगत-धार्मिक भेदभाव से जूझ रही है। अंतरराष्ट्रीय मंचों से लेकर समाज के भीतर तक तनाव, असहिष्णुता और अविश्वास की घटनाएं बढ़ी हैं। ऐसे परिवेश में गांधी के विचार आज पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। जानते हैं महात्मा गांधी के उन विचारों और संदेशों को..जो हमें जीवन के सही मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करते हैं।
वो विचार जो आज भी देते हैं जीवन को सही दिशा
अहिंसा: युद्ध, आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा के दौर में ‘अहिंसा परमो धर्म’ सबसे बड़ी ताकत है। गांधीजी का अहिंसा सिद्धांत बताता है कि हिंसा कभी स्थायी शांति नहीं ला सकती। युद्ध, आतंकवाद और सांप्रदायिक संघर्षों के बीच शांतिपूर्ण संवाद और नैतिक संघर्ष ही सबसे बेहतर समाधान हैं। इसी सोच के कारण संयुक्त राष्ट्र गांधी जयंती को ‘अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस’ के रूप में मनाता है। गांधीजी सिखाते हैं कि हिंसा से हिंसा बढ़ती है। वहीं शांतिपूर्ण प्रतिरोध (सत्याग्रह) से ही स्थायी बदलाव आता है।
सत्य और नैतिकता : राजनीति और समाज में झूठ, नफरत और दुष्प्रचार के दौर में गांधीजी का सत्याग्रह सत्य के लिए डटे रहने का साहस देता है..बिना हिंसा के लेकिन पूरी दृढ़ता के साथ। सत्याग्रह हमें याद दिलाता है कि सत्य के लिए पक्ष में नैतिक दृढ़ता के साथ खड़े रहना हिंसा से कहीं अधिक शक्तिशाली है।
धार्मिक सद्भाव और समानता: महात्मा गांधी ने हिंदू-मुस्लिम एकता के लिए जीवनभर संघर्ष किया। नोआखाली दंगों में उन्होंने अकेले शांति बहाल की। आज जब धार्मिक भेदभाव और हेट स्पीच बढ़ रहे हैं, उनके ‘सर्वधर्म समभाव’ और ‘सर्वोदय’ का संदेश एकता की नींव रखता है। जातिगत और धार्मिक भेदभाव के बीच गांधीजी का सर्वधर्म समभाव हमें सिखाता है कि विविधता संघर्ष नहीं बल्कि समाज की ताकत है।
सादगी, स्वदेशी और पर्यावरण चेतना: लालच और अत्यधिक उपभोग से उपजे संकट में उनकी सादगी और ‘पृथ्वी सबकी जरूरतों के लिए पर्याप्त है, लालच के लिए नहीं’ जैसा विचार आज जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई में बेहद प्रासंगिक है। अत्यधिक उपभोग और पर्यावरण संकट के समय गांधीजी की सादगी और स्वदेशी की सोच सतत विकास का मार्ग दिखाती है।
सामाजिक न्याय: अस्पृश्यता, जातिगत भेदभाव, असमानता और अल्पसंख्यक उत्पीड़न के खिलाफ उनका संघर्ष आज भी हमारा मार्गदर्शन करता है। उनके विचार आज भी सामाजिक न्याय और मानवाधिकार आंदोलनों को दिशा देते हैं। गांधीजी का जीवन हमें सिखाता है कि करुणा, समानता और आपसी सम्मान से ही सामाजिक सौहार्द कायम रह सकता है।





