
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली-एनसीआर के सार्वजनिक स्थानों से सभी आवारा कुत्तों को तुरंत हटाकर उन्हें आश्रय स्थलों में रखने का आदेश दिया है। इस निर्देश में दिल्ली, गुरुग्राम, नोएडा और गाजियाबाद शामिल हैं। इस फैसले ने व्यावहारिकता और व्यवहार्यता को लेकर गर्मागरम बहस छेड़ दी है। पूर्व केंद्रीय मंत्री और पशु अधिकार कार्यकर्ता मेनका गांधी ने इस आदेश को अव्यवहारिक, आर्थिक रूप से अस्थिर और क्षेत्र के पारिस्थितिक संतुलन के लिए संभावित रूप से हानिकारक बताया है। उन्होंने चेतावनी दी कि कुत्तों को हटाने से नई समस्याएं पैदा हो सकती हैं, जैसे अन्य शहरों से कुत्तों का आना और बंदरों का सड़कों पर उतरना।
मेनका गांधी ने 1880 के दशक के पेरिस का उदाहरण देते हुए कहा कि जब वहां कुत्तों और बिल्लियों को हटाया गया, तो शहर में चूहों की संख्या में तेजी से वृद्धि हुई। उस समय पेरिस में आवारा कुत्तों को रेबीज, पिस्सू और गंदगी फैलाने वाला माना जाता था। प्रशासन ने शहर को आधुनिक और सुरक्षित बनाने के लिए कुत्तों और बिल्लियों की बड़े पैमाने पर हत्या की थी। लेकिन इसके परिणामस्वरूप चूहों की संख्या बेकाबू हो गई, जो नालियों और गलियों से घरों तक फैल गए।
कुत्तों को नियंत्रित करने के प्रयास
ऐतिहासिक दस्तावेजों के अनुसार, 1870-71 के पेरिस घेराबंदी के दौरान भोजन की कमी के कारण लोगों को चूहे, बिल्लियां, कुत्ते और चिड़ियाघर के जानवर खाने पड़े थे। 1883 में रेबीज के डर से कुत्तों को नियंत्रित करने के प्रयास हुए, जैसा कि ‘Stray Dogs And The Making of Modern Paris’ शोध पत्र में उल्लेखित है। हालांकि, इस दौरान बिल्लियों की हत्या का कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है। एक फार्मासिस्ट, एमिल कैप्रोन ने आवारा कुत्तों को हटाने की अपील की थी, क्योंकि वे घोड़ों को डराते थे, जिससे दुर्घटनाएं होती थीं।
बिल्लियों को प्रताड़ित करके मारना
हालांकि, बिल्लियों की हत्या का एक उल्लेखनीय मामला 1730 के दशक में हुआ, जिसे इतिहासकार रॉबर्ट डार्नटन ने अपनी किताब ‘The Great Cat Massacre and Other Episodes in French Cultural History’ में दर्ज किया है। इसमें प्रिंटिंग प्रेस के कर्मचारियों द्वारा बिल्लियों को प्रताड़ित कर मारने का वर्णन है। यह घटना 1880 के दशक से अलग है, लेकिन यह दर्शाती है कि पशु नियंत्रण के प्रयासों का इतिहास जटिल और विवादास्पद रहा है।
