भारत और अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने शनिवार को एक महत्वपूर्ण बयान दिया। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि भारत वैश्विक व्यापार में अपनी शर्तों पर लेन-देन करेगा और किसी भी बाहरी दबाव में आकर फैसले नहीं लिए जाएंगे।
मुंबई में संघ यात्रा के 100 साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित एक व्याख्यानमाला को संबोधित करते हुए भागवत ने कहा कि हम दुनिया से कटकर नहीं रह सकते, लेकिन हमारे व्यापारिक फैसले देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने वाले होने चाहिए, न कि सिर्फ टैरिफ देखकर लिए जाने चाहिए।
‘घर के स्तर पर लागू करेंगे स्वदेशी’
मोहन भागवत ने स्वदेशी की वकालत करते हुए इसे घरेलू स्तर पर लागू करने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि जहां तक संभव हो, हमें स्वदेशी वस्तुओं का ही उपयोग करना चाहिए। विदेशी वस्तुओं को केवल तभी अपनाया जाना चाहिए जब देश में उसका कोई विकल्प मौजूद न हो।
“नीति के स्तर पर हम यह कहते हैं कि अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लेन-देन करना पड़ता है। नीति धीरे-धीरे चल रही है। नीति अपनी गति से बदलती है और आगे बढ़ेगी, लेकिन अपने घर के स्तर पर हम स्वदेशी को लागू करेंगे।” — मोहन भागवत, सरसंघचालक, RSS
उन्होंने यह भी कहा कि हम जो भी खरीदेंगे, वह हमारे देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत करने के उद्देश्य से होगा, किसी के दबाव में आकर नहीं।
भारत में चार तरह के हिंदू: भागवत
अपने संबोधन के दौरान मोहन भागवत ने भारत में हिंदुओं को लेकर भी एक विश्लेषण प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि भारत को यदि विश्व गुरु बनना है तो यह केवल भाषणों से संभव नहीं होगा, बल्कि हमें अपने कार्यों से उदाहरण पेश करना होगा।
उन्होंने कहा, ‘भारत में चार तरह के हिंदू हैं। पहले वे, जो गर्व से कहते हैं कि हम हिंदू हैं। दूसरे वे, जो कहते हैं कि हिंदू हैं तो क्या हुआ, इसमें गर्व की क्या बात है। तीसरे वे हैं, जो यह बात धीरे से बोलने को कहते हैं कि हम हिंदू हैं। और चौथे वे हैं, जो या तो भूल गए हैं कि वे हिंदू हैं या उन्हें यह भूलने पर मजबूर कर दिया गया है।’
यह कार्यक्रम 7 फरवरी, 2026 को मुंबई में आयोजित किया गया था, जिसमें संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में विभिन्न विषयों पर चर्चा की गई।





