
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को केरल सरकार से तीखा सवाल किया, जब पांच जजों की संविधान पीठ ने राष्ट्रपति की ओर से भेजे गए संदर्भ पर सुनवाई शुरू की। यह संदर्भ सुप्रीम कोर्ट के 12 अप्रैल के उस आदेश से संबंधित है, जिसमें राज्यपालों और राष्ट्रपति को राज्य विधानसभाओं द्वारा पारित बिलों पर सहमति देने के लिए समयसीमा का पालन करने का निर्देश दिया गया था। मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई ने केरल सरकार के वकील और पूर्व अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पूछा, “क्या आप वाकई गंभीर हैं?” जब उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्रपति संदर्भ सुनवाई योग्य नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश ने कहा, “जब राष्ट्रपति सवाल पूछ रहे हैं तो पांच जजों की पीठ सुनवाई क्यों नहीं कर सकती?” यह सवाल तब उठा जब केरल सरकार ने पहले के कुछ फैसलों का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि राष्ट्रपति संदर्भ सुनवाई योग्य नहीं है। मुख्य न्यायाधीश ने पूछा कि क्या ये फैसले पांच जजों की पीठ के थे, जिस पर वेणुगोपाल ने जवाब दिया कि वे दो और तीन जजों की पीठ के फैसले थे। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि राष्ट्रपति के सवाल पर पांच जजों की पीठ सुनवाई करने में क्या गलत है।
सहमति देने की प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 12 अप्रैल के आदेश में तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि और डीएमके सरकार से जुड़े मामले में बिलों पर सहमति देने की प्रक्रिया को नियंत्रित करने का प्रयास किया था। कोर्ट ने गृह मंत्रालय द्वारा निर्धारित समयसीमा को अपनाते हुए आदेश दिया था कि राष्ट्रपति को राज्यपाल द्वारा भेजे गए बिलों पर तीन महीने के भीतर निर्णय लेना होगा। इस आदेश के खिलाफ राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने संविधान के अनुच्छेद 143 के तहत 14 सवाल उठाए, जिसमें बिलों पर सहमति देने की शक्तियों और समयसीमा की संवैधानिकता पर सुप्रीम कोर्ट की राय मांगी गई।
बीआर गवई की अगुवाई वाली पीठ
जुलाई में मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई की अगुवाई वाली पीठ, जिसमें जस्टिस सूर्य कांत, विक्रम नाथ, पीएस नरसिम्हा और अतुल एस चंदुरकर शामिल थे, ने इस राष्ट्रपति संदर्भ मामले की सुनवाई के लिए समयसीमा तय की थी। कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को 12 अगस्त तक अपनी लिखित दलीलें जमा करने का निर्देश दिया था। यह सुनवाई राज्य विधानसभाओं की ओर से पारित बिलों पर राष्ट्रपति और राज्यपालों की शक्तियों और समयसीमा तय करने के मुद्दे पर महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
