“यह मुद्दा अदालत के सामने कितनी बार आएगा..” नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार, जानें वजह

सुप्रीम कोर्ट ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों को जापान के रेंकोजी मंदिर से भारत वापस लाने की याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया। सीजेआई सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता से पूछा कि बोस की बेटी ने सीधे तौर पर यह मांग क्यों नहीं की, जिसके बाद याचिका वापस ले ली गई।
“यह मुद्दा अदालत के सामने कितनी बार आएगा..” नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई से किया इनकार, जानें वजह

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को स्वतंत्रता सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियों को जापान से भारत वापस लाने के निर्देश देने की मांग वाली याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की पीठ ने जब याचिका पर सुनवाई करने में अनिच्छा व्यक्त की, तो याचिकाकर्ता ने इसे वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

यह याचिका नेताजी के एक रिश्ते के पोते आशीष राय ने दायर की थी। इसमें मांग की गई थी कि टोक्यो के रेंकोजी मंदिर में रखी अस्थियों को भारत लाकर उनका सम्मानपूर्वक विसर्जन किया जाए।

अदालत ने पूछे कड़े सवाल

याचिकाकर्ता की ओर से पेश वरिष्ठ वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने पीठ से कहा, “मैं परिवार के उन सदस्यों की ओर से पेश हो रहा हूं जो अस्थियों का सम्मानपूर्वक विसर्जन करना चाहते हैं।” इस पर सीजेआई सूर्यकांत ने सवाल किया कि यह मुद्दा अदालत के सामने कितनी बार आएगा, यह याद दिलाते हुए कि पिछले साल ही एक ऐसी ही याचिका खारिज की गई थी।

सिंघवी ने तर्क दिया कि यह मामला पहले आए मामलों से अलग है। उन्होंने कहा कि भारत के हर राष्ट्राध्यक्ष ने जापान के रेंकोजी मंदिर में श्रद्धांजलि अर्पित की है, जो इस बात का प्रमाण है। इस पर सीजेआई ने पूछा:

“सबसे पहली बात, अस्थियां कहां हैं? इसका क्या सबूत है? बोस हमारे राष्ट्र के महानतम नेताओं में से एक थे और हम सभी उनके बलिदान को नमन करते हैं।”

परिवार में मतभेद और बेटी की अनुपस्थिति

पीठ ने इस बात पर जोर दिया कि वह जानना चाहती है कि परिवार के कितने सदस्य इस याचिका का समर्थन कर रहे हैं। सिंघवी ने बताया कि बोस की एकमात्र उत्तराधिकारी उनकी 84 वर्षीय बेटी हैं और याचिकाकर्ता उनके रिश्ते के पोते हैं।

इस पर पीठ ने कहा, “बेटी हमारे सामने उपस्थित नहीं हैं। अगर उत्तराधिकारी अस्थियों को देश में लाना चाहती हैं तो उन्हें अदालत के सामने पेश होना होगा।” जब सिंघवी ने कहा कि बेटी ऑनलाइन माध्यम से मौजूद हैं, तो पीठ ने टिप्पणी की, “हम उनकी भावनाओं का सम्मान करते हैं। हम यह तय करेंगे कि उनकी भावनाओं को कानूनी कार्रवाई में बदला जाए लेकिन उन्हें आगे आना होगा। हमारी जानकारी के अनुसार घटना को लेकर परिवार में ही मतभेद हैं।”

अदालत के इस रुख के बाद, सिंघवी ने याचिका वापस लेने की अनुमति मांगी, जिसे पीठ ने प्रदान कर दिया। इससे नेताजी की अस्थियों को वापस लाने का एक और न्यायिक प्रयास समाप्त हो गया।

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