नई दिल्ली: नागरिकता संशोधन एक्ट (CAA) 2019 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट 5 मई से अंतिम सुनवाई शुरू करेगा। गुरुवार को मुख्य न्यायाधीश (CJI) की अध्यक्षता वाली बेंच ने सुनवाई का पूरा कार्यक्रम तय करते हुए बताया कि किस पक्ष को अपनी दलीलें रखने के लिए कितना समय दिया जाएगा।
यह फैसला देश भर में कानून के विरोध और समर्थन में चल रही बहस के बीच आया है, खासकर जब केंद्र सरकार ने हाल ही में इसके नियमों को अधिसूचित कर इसे प्रभावी बना दिया है।
243 याचिकाओं को दो समूहों में बांटा गया
सुनवाई को व्यवस्थित करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने सभी 243 याचिकाओं को दो मुख्य समूहों में बांटने का आदेश दिया है। पहला समूह असम और त्रिपुरा से जुड़े विशिष्ट मामलों का होगा, जबकि दूसरा समूह देश के बाकी हिस्सों से संबंधित याचिकाओं का होगा।
अदालत ने अपने आदेश में कहा, “नियुक्त नोडल वकील पहले और दूसरे ग्रुप में आने वाले मामलों की पहचान करेंगे और इसकी लिस्ट दो हफ्ते में रजिस्ट्री को सौंप दी जाएगी।”
इसके बाद रजिस्ट्री इन मामलों को दो श्रेणियों में सूचीबद्ध करेगी और 5 मई से शुरू होने वाले सप्ताह में अंतिम सुनवाई के लिए पेश किया जाएगा।
यह है सुनवाई का पूरा शेड्यूल
सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के लिए एक विस्तृत समय-सारणी निर्धारित की है ताकि सभी पक्षों को अपनी बात रखने का पर्याप्त मौका मिले।
- 5 मई: पहले आधे हिस्से में याचिकाकर्ताओं के वकील अपनी दलीलें रखेंगे।
- 6 मई: दूसरे आधे हिस्से में भी याचिकाकर्ताओं की सुनवाई जारी रहेगी।
- 7 मई: प्रतिवादियों (केंद्र सरकार) को अपना पक्ष रखने के लिए आधा दिन दिया जाएगा।
- 12 मई: याचिकाकर्ताओं द्वारा जवाब दाखिल किया जाएगा।
यह मामला चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI), जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच के सामने सुना जाएगा।
क्या है CAA कानून और क्यों है विवाद?
संसद ने 11 दिसंबर, 2019 को नागरिकता संशोधन एक्ट पारित किया था। इस कानून का उद्देश्य पाकिस्तान, बांग्लादेश और अफगानिस्तान से 31 दिसंबर, 2014 तक भारत आए हिंदू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देना है।
हालांकि, इस कानून में मुस्लिम समुदाय को शामिल नहीं किया गया है, जिसे लेकर देश भर में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि यह कानून धर्म के आधार पर भेदभाव करता है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है। कानून के पारित होते ही इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, जिसके बाद 200 से ज्यादा याचिकाएं दायर की गईं।
मार्च 2024 में केंद्र सरकार द्वारा नियमों को अधिसूचित किए जाने के बाद कानून को लागू करने का रास्ता साफ हो गया था। इसके बाद, याचिकाकर्ताओं ने अदालत से कानून और नियमों पर तत्काल रोक लगाने की मांग की थी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम रोक लगाने से इनकार करते हुए केंद्र सरकार से जवाब मांगा था।





