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जन्माष्टमी की अनोखी परंपराएं: कहीं बनते हैं बाल कृष्ण के पदचिन्ह तो कहीं होता है रास नृत्य

इस पर्व की सबसे खास बात यही है कि देश के अलग अलग हिस्सों में कृष्ण भक्ति का स्वरूप स्थानीय संस्कृति के रंग में ढल जाता है। कहीं नाटक और नृत्य के जरिए कृष्णलीला होती है तो कहीं दही की मटकी फोड़कर कान्हा की बाल लीलाओं को याद किया जाता है। गुजरात की महिलाओं का ताश खेलना और जम्मू की पतंगबाजी जैसी परंपराएं इस त्योहार को और भी उल्लास से भर देती हैं।
Shri Krishna Janmashtami

Shri Krishna Janmashtami

भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व जन्माष्टमी आज देशभर में श्रद्धा और हर्षोल्लास के साथ मनाया जा रहा है। मंदिरों में विशेष सजावट, झांकियों और भजन कीर्तन का आयोजन हो रहा है, वहीं घरों में श्रद्धालु बाल गोपाल की पूजा अर्चना कर रहे हैं। कई स्थानों पर रात 12 बजे भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा और अभिषेक किया जाएगा।

जन्माष्टमी का उत्साह केवल मथुरा वृंदावन या महाराष्ट्र की दही हांडी तक सीमित नहीं है। देश के अलग अलग हिस्सों में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव से जुड़ी ऐसी कई क्षेत्रीय और अनोखी परंपराएं हैं, जिनके बारे में देश के दूसरे हिस्सों में रहने वाले बहुत से लोग शायद ही जानते हों।

जन्माष्टमी की कथा

हिंदू धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को मध्यरात्रि में मथुरा की जेल में हुआ था। उन्हें भगवान विष्णु का आठवां अवतार माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार मथुरा के राजा कंस को आकाशवाणी हुई थी कि उसकी बहन देवकी का आठवां पुत्र उसका वध करेगा। इसके बाद कंस ने देवकी और उनके पति वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया। देवकी की छह संतानों का कंस ने वध कर दिया, जबकि सातवें गर्भ से बलराम के गोकुल पहुंचने की कथा मिलती है।

इसके बाद आठवें पुत्र के रूप में श्रीकृष्ण का जन्म हुआ। मान्यता है कि जन्म के समय कारागार के द्वार खुल गए और पहरेदार गहरी नींद में सो गए। वसुदेव नवजात कृष्ण को लेकर यमुना पार कर गोकुल पहुंचे और उन्हें नंद यशोदा के घर छोड़ आए। इसी घटना की स्मृति में जन्माष्टमी पर मध्यरात्रि में कृष्ण जन्म का उत्सव मनाया जाता है।

जन्माष्टमी की परंपरा

जन्माष्टमी पर श्रद्धालु व्रत रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय पूजा, अभिषेक और आरती करते हैं। घरों और मंदिरों में बाल गोपाल का झूला सजाया जाता है, झांकियां निकाली जाती हैं और माखन मिश्री का भोग लगाया जाता है। कई स्थानों पर भजन कीर्तन, रासलीला और दही हांडी जैसे आयोजन भी किए जाते हैं। लेकिन देश के अलग-अलग स्थानों पर कुछ ऐसी परंपराएं भी हैं, जिसके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं।

तमिलनाडु में घर तक बनाए जाते हैं बाल कृष्ण के पैरों के निशान

तमिलनाडु में जन्माष्टमी को गोकुलाष्टमी या श्री जयंती भी कहा जाता है। यहां कई घरों में चावल के आटे से छोटे छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं। ये निशान घर के दरवाजे से पूजा स्थल तक बनाए जाते हैं। मान्यता है कि इन पदचिन्हों के ज़रिए बाल कृष्ण का घर में स्वागत किया जाता है। इस दिन सीडै, मुरुक्कू और अप्पम जैसे पारंपरिक पकवान भी भगवान को अर्पित किए जाते हैं।

विदर्भ में कृष्ण को कानोबा कहकर मनाते हैं जन्मोत्सव

महाराष्ट्र के पूर्वी विदर्भ के झाड़ीपट्टी क्षेत्र में जन्माष्टमी को कानोबा के नाम से मनाने की अनोखी परंपरा है। यहां कृष्ण के इस स्थानीय नाम के साथ उत्सव में ग्रामीण और कृषि संस्कृति की भी झलक दिखाई देती है। खास बात यह है कि उत्सव से लगभग एक सप्ताह पहले गेहूं बोकर उससे उगी भुजली तैयार की जाती है, जिसे पूजा में शामिल किया जाता है। भजन कीर्तन और आधी रात की आरती के बाद सामूहिक भोजन की परंपरा भी है। यह उत्सव भगवान कृष्ण की भक्ति के साथ खेती और अच्छी फसल की कामना से भी जुड़ा हुआ है।

केरल में मटकी फोड़ने की अलग परंपरा

केरल में जन्माष्टमी को अष्टमी रोहिणी कहा जाता है। यहां कृष्ण जन्मोत्सव में बच्चों को कृष्ण और गोपिका के रूप में सजाकर शोभायात्रा निकालने की परंपरा भी है। इसके अलावा उरियाडी नामक मटकी फोड़ आयोजन होता है। यह महाराष्ट्र की दही हांडी से मिलता जुलता जरूर है लेकिन इसकी स्थानीय शैली अलग है। केरल में भगवान कृष्ण की बाल लीलाओं को याद करते हुए मटकी फोड़ने का आयोजन किया जाता है।

उडुपी में जन्माष्टमी के अगले दिन होता है मोसरु कुडिके

कर्नाटक के उडुपी में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के बाद विट्ठल पिंडी या मोसरु कुडिके की परंपरा देखने को मिलती है। इसमें दही से जुड़ी मटकी फोड़ने की रस्म और रथ यात्रा आयोजित की जाती है। यह परंपरा कृष्ण की बाल लीलाओं और उनके माखन दही प्रेम की याद दिलाती है।

असम में जन्माष्टमी पर रातभर चलता है भाओना

असम में जन्माष्टमी सिर्फ पूजा तक सीमित नहीं रहती। यहां कई वैष्णव सत्रों में रातभर नाम प्रसंग और कीर्तन होते हैं। इसके साथ ही भाओना नाम की पारंपरिक नाट्य शैली में कृष्ण की लीलाओं का मंचन किया जाता है। इस तरह असम में जन्माष्टमी धार्मिक अनुष्ठान के साथ वहां की सदियों पुरानी नाट्य और वैष्णव संस्कृति को भी सामने लाती है।

ओडिशा में गांवों की भागवत टुंगी में रातभर पाठ

ओडिशा में कई ग्रामीण इलाकों में जन्माष्टमी के अवसर पर भागवत टुंगी यानी सामुदायिक धार्मिक स्थल पर श्रीमद्भागवत के पाठ की परंपरा है। जन्माष्टमी की रात विशेष रूप से भगवान कृष्ण से जुड़े प्रसंगों का पाठ और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

मणिपुर में कृष्ण जन्मोत्सव के साथ रास नृत्य

मणिपुर की वैष्णव परंपरा में श्रीकृष्ण का विशेष स्थान है। यहां जन्माष्टमी के अवसर पर मणिपुरी रास परंपरा और नृत्य के जरिए कृष्ण की लीलाओं को प्रस्तुत किया जाता है। इम्फाल के श्री गोविंदजी मंदिर से जुड़ी धार्मिक परंपराओं में भी इसका विशेष महत्व है।

बंगाल में जन्माष्टमी के बाद मनाया जाता है नंदोत्सव

पश्चिम बंगाल में जन्माष्टमी को कई जगह गोपाल पूजा के रूप में भी मनाया जाता है। इसके अगले दिन नंदोत्सव मनाने की परंपरा है। वैष्णव केंद्र मायापुर और नवद्वीप में जन्माष्टमी से जुड़े आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र रहते हैं।

ब्रज में जन्माष्टमी के बाद नंदोत्सव का अलग उत्साह

मथुरा वृंदावन में कृष्ण जन्म की मध्यरात्रि के बाद अगले दिन नंदोत्सव मनाया जाता है। इसे उस खुशी की स्मृति माना जाता है, जब नंद बाबा के घर कृष्ण के जन्म की खबर पहुंची थी। ब्रज क्षेत्र में जन्माष्टमी के दौरान झांकियों और रासलीला की विशेष परंपरा भी है। गोकुल में नंदोत्सव के दिन लोग एक दूसरे पर दही और हल्दी छिड़कते हैं जो उस आनंद का प्रतीक है।

गुजरात में महिलाएं खेलती हैं ताश और बनाती हैं कानुडो

गुजरात में जन्माष्टमी की एक बहुत कम ज्ञात परंपरा है कि महिलाएं घर का सारा काम छोड़कर रात भर ताश खेलती हैं। दिनभर व्रत रखकर मध्यरात्रि तक जागने के लिए परिवार के साथ रम्मी और तीन पत्ती जैसे खेल खेले जाते हैं। कच्छ के कई गांवों में महिलाएं खुद तालाब की मिट्टी से कानुडो यानी कृष्ण की मूर्ति बनाती हैं, उसे सजाती हैं और घर घर ले जाकर रास भजन करती हैं। अंत में मूर्ति का विसर्जन भी महिलाएं ही करती हैं।

जम्मू में पतंगबाजी और तीरा की परंपरा

जम्मू क्षेत्र में जन्माष्टमी को थोगरे या ठाकुर दा व्रत कहा जाता है। इस दिन से पतंग उड़ाने का मौसम शुरू होता है। महिलाएं हाथों पर तीरा यानी स्थानीय पौधे से निकाला गया रंग लगाती हैं और जंड वृक्ष की पूजा करती हैं। डोगरा समुदाय में पूर्वजों और कुलदेवताओं के नाम पर अन्न दान करने की भी परंपरा रही है।

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha
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