नेशनल एकेडमी ऑफ लीगल स्टडीज एंड रिसर्च (NALSAR) हैदराबाद के छात्रों के खिलाफ बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) की कार्रवाई को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को महत्वपूर्ण फैसला सुनाया। अदालत ने स्पष्ट किया कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 के तहत BCI या किसी राज्य बार काउंसिल को कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई करने का अधिकार नहीं है। यह अधिकार तब शुरू होता है, जब कानून का स्नातक बतौर अधिवक्ता पंजीकृत हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से यह भी स्पष्ट हो गया कि किसी लॉ यूनिवर्सिटी में पढ़ रहे छात्र के आचरण पर कार्रवाई का अधिकार संबंधित विश्वविद्यालय या शैक्षणिक संस्थान के सक्षम प्राधिकारी के पास है। BCI कानूनी शिक्षा के मानक तय और लागू कर सकता है, लेकिन छात्र के व्यक्तिगत आचरण को लेकर उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं कर सकता।
कैसे शुरू हुआ विवाद
पूरा मामला हैदराबाद की NALSAR यूनिवर्सिटी के 2026 बैच से जुड़ा है। विश्वविद्यालय के करीब 450 अंतिम वर्ष के छात्रों ने जुलाई में कुलपति को ईमेल कर दीक्षांत समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत को आमंत्रित करने की परंपरा पर पुनर्विचार करने का अनुरोध किया था। छात्रों की इस पहल के बाद मामला विवाद में आ गया।
13 अगस्त को BCI ने राज्य बार काउंसिलों को NALSAR के 2026 बैच के छात्रों के नामांकन पर रोक लगाने का निर्देश दिया। साथ ही विश्वविद्यालय से घटनाक्रम को लेकर रिपोर्ट मांगी गई और छात्रों तथा शिक्षकों के खिलाफ जांच की बात सामने आई। हालांकि, कुछ ही घंटों में BCI ने अपना आदेश वापस ले लिया और स्पष्ट किया कि इस बैच के छात्रों की किसी कथित गड़बड़ी में भूमिका नहीं पाई गई।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही लगा दी थी कार्रवाई पर रोक
मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचने के बाद 14 अगस्त को तीन सदस्यीय पीठ ने BCI और राज्य बार काउंसिलों को NALSAR के छात्रों और शिक्षकों के खिलाफ संबंधित घटनाओं के आधार पर कोई दंडात्मक कार्रवाई नहीं करने का अंतरिम निर्देश दिया था। अदालत ने BCI से जवाब भी मांगा था। उस समय सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने BCI की कार्रवाई पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उनका कहना था कि छात्रों को अपनी बात रखने और शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का अधिकार है।
अब आया अहम फैसला
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले में कानूनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 BCI या राज्य बार काउंसिलों को कानून के छात्रों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई की कोई स्पष्ट या निहित शक्ति नहीं देता।
अदालत के मुताबिक, कानून के छात्र के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई उसके मूल शैक्षणिक संस्थान या उसके नियमों के तहत निर्धारित सक्षम प्राधिकारी ही कर सकता है। BCI का अनुशासनात्मक अधिकार उस समय लागू होता है, जब कानून का स्नातक अधिवक्ता के रूप में पंजीकृत हो जाता है।
BCI के संबंधित आदेश कानून के अधिकार के बिना जारी हुए
सुप्रीम कोर्ट ने 13 अगस्त को जारी BCI के मूल निर्देश और उसके बाद किए गए संशोधित संचारों को कानून के किसी अधिकार के बिना जारी किया गया घोषित किया है। अदालत ने पहले दिए गए अंतरिम संरक्षण को भी स्थायी कर दिया।इसका मतलब ये होता है कि NALSAR के छात्रों और शिक्षकों को इन घटनाओं के आधार पर BCI या किसी राज्य बार काउंसिल की ओर से दंडात्मक कार्रवाई का सामना नहीं करना पड़ेगा।






