पश्चिम बंगाल में मतदाता सूची से कटे मतुआ समुदाय के लाखों लोगों के नाम, BJP-TMC की बढ़ी चिंता, पढ़ें पूरी खबर

पश्चिम बंगाल में SIR के तहत वोटर लिस्ट की गहन समीक्षा के दौरान नवंबर से अब तक 63 लाख से अधिक नाम हटाए गए हैं और करीब 60 लाख नाम अब भी जांच में हैं। इस प्रक्रिया का बड़ा असर मतुआ समुदाय पर बताया जा रहा है, जहां कई सीटों पर 25 से 40 हजार तक नाम कटने की बात सामने आई है। विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा BJP और TMC, दोनों के लिए राजनीतिक चुनौती बन गया है।
uk Final Voter List

पश्चिम बंगाल की चुनावी राजनीति में मतुआ समुदाय की अहमियत पहले से रही है, लेकिन इस बार चर्चा वोटिंग रुझान से ज्यादा वोटर लिस्ट से नाम हटने पर केंद्रित है। स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) के दौरान बड़े पैमाने पर नाम हटने की प्रक्रिया ने नागरिकता, पहचान और मतदान अधिकार को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।

चुनाव आयोग ने 2002 के बाद पहली बार वोटर लिस्ट की गहन जांच शुरू की। इस प्रक्रिया में जिन लोगों का नाम 2002 की सूची में नहीं मिला, उनसे पहचान और नागरिकता से जुड़े दस्तावेज मांगे गए। जिनके दस्तावेज मानकों के अनुरूप नहीं थे, उनके नाम सूची से हटाए गए।

उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार नवंबर से अब तक 63 लाख से ज्यादा नाम हटाए जा चुके हैं। इसके साथ ही लगभग 60 लाख नाम अब भी जांच के अधीन बताए जा रहे हैं। यह संख्या बताती है कि प्रक्रिया का दायरा सीमित नहीं, बल्कि राज्यव्यापी है।

मतुआ-बहुल इलाकों में असर और 50 सीटों का समीकरण

मामले का सबसे संवेदनशील हिस्सा यह है कि कई मतुआ-बहुल सीटों पर 25,000 से 40,000 तक नाम कटने की बात सामने आई है। इन इलाकों में यह केवल प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, सीधे चुनावी गणित से जुड़ा मुद्दा बन गया है। रिपोर्ट के मुताबिक हर विधानसभा क्षेत्र से इस समुदाय के लोगों के नाम हटे हैं।

पश्चिम बंगाल की करीब 50 सीटों पर मतुआ समुदाय का प्रभाव माना जाता है। यही वजह है कि नाम कटने की खबरें आते ही राजनीतिक दलों की प्रतिक्रिया तेज हुई। चुनाव नतीजों को प्रभावित करने वाली इस सामाजिक-राजनीतिक ताकत पर असर, दोनों प्रमुख दलों के लिए चिंता का कारण है।

BJP और TMC की अलग लाइन, लेकिन दबाव दोनों पर

2019 के बाद यह समुदाय बड़ी संख्या में BJP के साथ जुड़ा था। अब जब नाम हटने का मुद्दा सामने आया है, BJP अपने समर्थक आधार को आश्वस्त करने और नाम बचाने की कोशिश में दिख रही है। दूसरी तरफ TMC लगातार SIR पर सवाल उठाती रही है और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी शुरुआत से इस प्रक्रिया का विरोध करती रही हैं।

TMC का तर्क है कि 2002 के बाद आए कई लोगों के पास जरूरी दस्तावेज नहीं हैं, इसलिए नाम हटने का जोखिम बढ़ा है और इससे मतदान अधिकार प्रभावित हो सकता है। इस दावे के साथ पार्टी इसे चुनाव से पहले का बड़ा जनाधिकार मुद्दा बना रही है।

“अगर किसी शरणार्थी का नाम हटता है, तो उसे CAA के तहत नागरिकता मिल सकती है।”- केंद्रीय मंत्री शांतनु ठाकुर

शांतनु ठाकुर का यह बयान उस वर्ग को संदेश देने की कोशिश माना जा रहा है जो दस्तावेज और नागरिकता को लेकर आशंकित है। हालांकि, जमीनी स्तर पर नाम बहाली, दस्तावेज सत्यापन और अंतिम सूची में शामिल होने की प्रक्रिया ही तय करेगी कि राहत कितनी मिलती है।

चुनाव से पहले बढ़ी राजनीतिक गर्मी

विधानसभा चुनाव से पहले लाखों नाम हटने और बड़ी संख्या में आवेदनों के लंबित रहने ने राज्य में राजनीतिक सरगर्मी बढ़ा दी है। फिलहाल मुद्दा केवल तकनीकी या प्रशासनिक नहीं रह गया है। यह सीधे पहचान, प्रतिनिधित्व और वोट बैंक की राजनीति से जुड़ गया है। आने वाले दिनों में जांच पूरी होने और अंतिम निर्णय के साथ इसका चुनावी असर और स्पष्ट होगा।

Shyam Dwivedi
लेखक के बारे में
Shyam Dwivedi

7 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव.

पत्रकार वह व्यक्ति होता है जो समाचार, घटनाओं, और मुद्दों की जानकारी देता है, उनकी जांच करता है, और उन्हें विभिन्न माध्यमों जैसे अखबार, टीवी, रेडियो, या ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर प्रस्तुत करता है। मेरा नाम श्याम बिहारी द्विवेदी है और मैं पिछले 7 वर्षों से पत्रकारिता के क्षेत्र में अपनी सेवाएं दे रहा हूं। मुझे डिजिटल से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का अनुभव है। View all posts by Shyam Dwivedi →
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