राजस्थान विधानसभा में बुधवार को प्रश्नकाल के दौरान खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति से जुड़ा एक सवाल राजनीतिक टकराव का केंद्र बन गया। मुद्दा था नीमकाथाना क्षेत्र में राशन दुकानों का आवंटन, और जवाब दे रहे थे जल संसाधन मंत्री सुरेश सिंह रावत। जैसे-जैसे जवाब आगे बढ़ा, सदन में प्रक्रियात्मक पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही पर तीखे प्रश्न उठने लगे।
मंत्री रावत ने सदन को बताया कि संबंधित मामले में कुल 10 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें से तीन को राशन दुकानें आवंटित की गईं, दो आवेदन निरस्त किए गए, जबकि चार मामलों में मार्गदर्शन मांगा गया है। मंत्री के इस बिंदु पर विपक्षी और कांग्रेस विधायकों ने यह पूछना शुरू किया कि जब नियम स्पष्ट हैं, तो मार्गदर्शन की जरूरत क्यों पड़ रही है।
प्रश्नकाल में ‘मार्गदर्शन’ शब्द पर बढ़ा विवाद
कांग्रेस विधायक सुरेश मोदी ने मंत्री के जवाब पर आपत्ति जताते हुए कहा कि आवंटन के लिए स्पष्ट प्रावधान होने के बावजूद मार्गदर्शन मांगना संदेह पैदा करता है। उन्होंने यह भी कहा कि ऐसी स्थिति से भ्रष्टाचार की आशंका बनती है। जब मंत्री ने लिखित जवाब दोहराया, तब मोदी ने सीधे पूछा कि मार्गदर्शन आखिर किससे मांगा जा रहा है।
“क्या आप महात्मा गांधी से मार्गदर्शन लेना चाहते हैं?”- सुरेश मोदी
सदन में स्थिति तब और स्पष्ट हुई जब विधानसभा अध्यक्ष ने मंत्री को तथ्य स्पष्ट करने के लिए कहा। इसके बाद मंत्री रावत ने बताया कि मार्गदर्शन जिला कलेक्टर से मांगा गया है। इस जवाब पर उपनेता प्रतिपक्ष रामकेश मीणा ने सरकार की कार्यप्रणाली की आलोचना करते हुए कहा कि अगर मंत्री को कलेक्टर से मार्गदर्शन लेना पड़े तो यह सरकार के लिए गंभीर संकेत है।
मंत्री ने सफाई में कहा कि जिला आपूर्ति अधिकारी ने कलेक्टर से मार्गदर्शन मांगा है, और मार्गदर्शन मिलते ही आवंटन पर निर्णय ले लिया जाएगा। इस दौरान विधानसभा अध्यक्ष ने भी टिप्पणी की कि सामान्य तौर पर कलेक्टर मंत्री से मार्गदर्शन लेते हैं, न कि मंत्री कलेक्टर से। इस टिप्पणी के बाद सदन में कुछ समय तक राजनीतिक प्रतिक्रिया जारी रही, लेकिन मूल सवाल प्रक्रिया की पारदर्शिता और निर्णय की समयसीमा पर ही केंद्रित रहा।
उसी सत्र में दो अहम संशोधन विधेयक भी पेश
राशन दुकान आवंटन पर बहस के बीच राज्य सरकार ने स्थानीय चुनावों से जुड़े दो महत्वपूर्ण संशोधन विधेयक भी पेश किए। इनका उद्देश्य पंचायती राज संस्थाओं और शहरी निकायों के चुनाव में लागू दो-बच्चों की पात्रता शर्त को हटाना है।
पंचायती राज मंत्री मदन दिलावर ने पंचायती राज संशोधन विधेयक सदन में प्रस्तुत किया। प्रस्तावित बदलाव के अनुसार, वार्ड पंच, सरपंच, पंचायत समिति सदस्य, जिला परिषद सदस्य, पंचायत समिति प्रधान और जिला प्रमुख जैसे पदों के चुनाव में दो से अधिक बच्चों वाले उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने वाला प्रावधान हटाने का प्रस्ताव है।
इसी क्रम में नगरीय विकास एवं आवासन मंत्री झाबर सिंह खर्रा ने नगर पालिका संशोधन विधेयक पेश किया। इसमें पार्षद, मेयर, नगर पालिका अध्यक्ष और अन्य शहरी निकाय पदों के लिए चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर लागू दो-बच्चों की सीमा समाप्त करने का प्रस्ताव रखा गया है।
सदन का फोकस: प्रशासनिक निर्णय और चुनावी पात्रता
दिन की कार्यवाही में एक ओर राशन दुकानों के आवंटन की प्रशासनिक प्रक्रिया पर सवाल उठे, तो दूसरी ओर स्थानीय लोकतांत्रिक संस्थाओं में उम्मीदवारों की पात्रता से जुड़ा नीतिगत बदलाव सामने आया। प्रश्नकाल की बहस ने यह संकेत दिया कि नियम मौजूद होने के बावजूद क्रियान्वयन की परतों पर सदन में जांच-पड़ताल तेज है। दूसरी तरफ, दो संशोधन विधेयकों ने चुनावी पात्रता के ढांचे में संभावित बदलाव की औपचारिक शुरुआत कर दी है।
अब आगे की दिशा इस बात से तय होगी कि नीमकाथाना के लंबित आवंटन मामलों पर जिला स्तर से मार्गदर्शन कब तक आता है, और दो-बच्चों की शर्त हटाने वाले विधेयकों पर सदन में आगे क्या रुख बनता है।





