मध्य प्रदेश के रतलाम जिले में एक गांव ऐसा है, जहां दशहरा अनोखे ढंग से मनाया जाता है। दरअसल देश भर में जहां शरद नवरात्रि के बाद रावण का पुतला जलाकर बुराई पर अच्छाई की जीत का जश्न होता है, तो वहीं रतलाम से करीब 55 किलोमीटर दूर चिकलाना गांव में रावण का दहन नहीं किया जाता है। बता दें कि यहां चैत्र नवरात्रि के दसवें दिन रावण की नाक काटकर उसका प्रतीकात्मक अंत होता है। यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है और आज भी गांव के लोग इसे पूरी श्रद्धा और उत्साह के साथ निभाते हैं।
दरअसल चिकलाना की यह परंपरा देश के आम दशहरे उत्सव से बिल्कुल जुदा है। आमतौर पर दशहरे का पर्व शरद नवरात्रि के बाद आता है, लेकिन चिकलाना में यह चैत्र नवरात्रि के दसवें दिन मनाया जाता है। वहीं गांव के लोग रावण को जलाने के बजाय उसके अहंकार को चूर-चूर करने में यकीन रखते हैं।
जानिए क्या है परंपरा?
वहीं स्थानीय मान्यता यह है कि किसी की नाक काटना सबसे बड़े अपमान का प्रतीक है। इसलिए, रावण के परम अहंकार को तोड़ने और उसके कुकर्मों का प्रतिशोध लेने के लिए उसकी नाक काटी जाती है। वहीं गांव के दशहरा मैदान में रावण की एक 15 फीट ऊंची स्थायी मूर्ति स्थापित की गई है। हर साल इसी मूर्ति पर यह ऐतिहासिक रस्म अदा की जाती है। दरअसल इस अनोखे ‘प्रतीकात्मक वध’ के लिए चैत्र नवरात्रि के दसवें दिन पूरे गांव में एक भव्य समारोह होता है। इस दिन चिकलाना गांव में एक अलग ही माहौल देखने को मिलता है। सुबह से ही गांव के लोग दशहरा मैदान की ओर जुटने लगते हैं और उत्सव की तैयारियां शुरू हो जाती हैं।
गांव में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है
दरअसल कार्यक्रम की शुरुआत में ढोल-नगाड़ों की जोरदार धुन पर पूरे गांव में एक भव्य शोभायात्रा निकाली जाती है। यह शोभायात्रा गांव की गलियों से गुजरते हुए दशहरा मैदान पहुंचती है, जहां रावण की विशाल मूर्ति स्थापित है। वहीं मैदान में पहुंचने के बाद भगवान राम और रावण की सेनाएं आमने-सामने खड़ी होती हैं। दोनों पक्षों के बीच वाकयुद्ध का एक स्वांग रचा जाता है, जिसमें अच्छाई और बुराई के बीच संवाद होता है। यह वाकयुद्ध प्रतीकात्मक रूप से रावण के कुकर्मों और राम की न्यायप्रियता को दर्शाता है। यह सिर्फ एक नाटक नहीं, बल्कि गांव के लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सांस्कृतिक प्रस्तुति है। इस दृश्य को देखने के लिए सैकड़ों की संख्या में ग्रामीण इकट्ठा होते हैं, जिनकी भीड़ उत्सव में चार चांद लगा देती है।
ऐसे काटी जाती है नाक
वाकयुद्ध के बाद, गांव का एक प्रतिष्ठित व्यक्ति आगे बढ़ता है। यह व्यक्ति आमतौर पर गांव का कोई सम्मानित बुजुर्ग या पंच होता है, जिसे इस विशेष रस्म के लिए चुना जाता है। वह अपने हाथ में एक भाला लेकर रावण की 15 फीट ऊंची मूर्ति की नाक पर जोरदार वार करता है। भाले के वार से रावण की नाक खंडित हो जाती है, जिसे प्रतीकात्मक रूप से काटना माना जाता है। इस क्षण को रावण के अहंकार का अंत और बुराई पर अच्छाई की प्रतीकात्मक जीत के रूप में देखा जाता है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी गांव के लोगों द्वारा पूरे उत्साह और विश्वास के साथ निभाई जा रही है, जो इसे और भी खास बनाती है।






