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क्या सातों जन्मों तक एक ही पति मिलता है? प्रेमानंद महाराज ने बताया जीवन का गूढ़ सत्य

Written by:Bhawna Choubey
Published:
क्या पति-पत्नी का रिश्ता केवल इस जन्म तक सीमित होता है या सातों जन्मों तक साथ निभाने का विधान भी संभव है? प्रेमानंद महाराज ने कर्म, प्रारब्ध और भक्ति के आधार पर इस भावनात्मक सवाल का बेहद सरल और गूढ़ उत्तर दिया है।
क्या सातों जन्मों तक एक ही पति मिलता है? प्रेमानंद महाराज ने बताया जीवन का गूढ़ सत्य

सनातन संस्कृति में विवाह को केवल सामाजिक बंधन नहीं, बल्कि आत्माओं का संबंध माना गया है। बचपन से ही हम कहानियों, भजनों और कथाओं में सुनते आए हैं, सात जन्मों का साथ। यही कारण है कि मन में यह सवाल बार-बार उठता है कि क्या सच में पति-पत्नी का रिश्ता सातों जन्मों तक चलता है या यह केवल एक भावनात्मक विश्वास है।

इसी गहरे और संवेदनशील प्रश्न का उत्तर हाल ही में संत प्रेमानंद महाराज ने अपने एक प्रवचन में दिया, जो अब सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। यह सवाल एक महिला भक्त ने उनसे पूछा था क्या संभव है कि उसे सातों जन्मों में एक ही पति मिले? इस प्रश्न में केवल जिज्ञासा नहीं, बल्कि प्रेम, समर्पण और डर सब कुछ छिपा हुआ था।

प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट उत्तर

प्रेमानंद महाराज ने इस सवाल का उत्तर बहुत सीधे, लेकिन आध्यात्मिक गहराई के साथ दिया। उन्होंने कहा कि सामान्य स्थिति में यह आवश्यक नहीं है कि एक ही पति या पत्नी सातों जन्मों में मिले। कारण साफ है, हर जन्म में जीव के कर्म और प्रारब्ध बदल जाते हैं। उन्होंने समझाया कि यह संसार कर्म के नियम से चलता है। हम जो कर्म इस जन्म में करते हैं, वही अगले जन्म की दिशा तय करते हैं। कोई भी व्यक्ति केवल भावनाओं के आधार पर यह तय नहीं कर सकता कि अगले जन्म में उसका संबंध किससे होगा, किस रूप में होगा या किस योनि में जन्म मिलेगा।

पति-पत्नी के रिश्ते की असली नींव

प्रेमानंद महाराज ने बताया कि पति-पत्नी का संबंध भी कर्मों से ही जुड़ा होता है। इस जन्म में जो व्यक्ति हमारा जीवनसाथी है, वह हमारे पूर्व जन्मों के कर्मों का परिणाम है। लेकिन यह जरूरी नहीं कि वही व्यक्ति अगले जन्म में भी उसी रूप में हमारे साथ जुड़ा हो। उन्होंने कहा कि कई बार ऐसा भी होता है कि एक व्यक्ति मनुष्य योनि में जन्म लेता है, जबकि दूसरा किसी और योनि में चला जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि दोनों के कर्म अलग-अलग होते हैं। कर्म का विधान इतना सूक्ष्म है कि उसे केवल प्रेम या चाहत से बदला नहीं जा सकता।

क्या भगवान की कृपा से सात जन्मों का साथ संभव है?

यहां प्रेमानंद महाराज ने एक बेहद महत्वपूर्ण बात कही। उन्होंने स्पष्ट किया कि कर्म का नियम सर्वोपरि है, लेकिन भगवान की कृपा उससे भी ऊपर है। अगर कोई स्त्री या पुरुष पूरी निष्ठा, संयम और समर्पण के साथ भगवान की भक्ति करे और उनसे यह वरदान मांगे कि वही जीवनसाथी अगले जन्मों में भी मिले, तो भगवान चाहें तो ऐसा कर सकते हैं। महाराज कहते हैं कि ईश्वर सृष्टि के रचयिता हैं। उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है। लेकिन इसके लिए केवल इच्छा नहीं, बल्कि गहरी भक्ति, त्याग और तपस्या चाहिए। भगवान भाव नहीं, बल्कि भाव के पीछे की साधना देखते हैं।

हाथी और राजकुमारी की मार्मिक कथा

अपने उत्तर को और सरल बनाने के लिए प्रेमानंद महाराज ने एक भावुक कथा सुनाई। उन्होंने बताया कि एक जन्म में एक पति अपनी पत्नी से बहुत प्रेम करता था, लेकिन वह भक्ति मार्ग पर नहीं चला। उसने गुरु दीक्षा नहीं ली और सांसारिक मोह में ही उलझा रहा। मृत्यु के बाद पत्नी अपनी भक्ति के कारण अगले जन्म में एक राजकुमारी बनी, जबकि पति अपनी आसक्ति और अधूरे कर्मों के कारण हाथी की योनि में चला गया। यह सुनकर श्रोताओं का मन द्रवित हो गया।

भक्ति की शक्ति से संभव हुआ पुनर्मिलन

कथा यहीं समाप्त नहीं होती। प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि राजकुमारी बनी पत्नी ने जब अपने पूर्व जन्म के पति को हाथी के रूप में देखा, तो उसका हृदय करुणा से भर गया। उसने भगवान से प्रार्थना की और कठोर तपस्या की।

उसकी भक्ति और तप के प्रभाव से हाथी को उस योनि से मुक्ति मिली। इसके बाद दोनों का पुनर्मिलन संभव हुआ। इस कथा के माध्यम से महाराज ने समझाया कि केवल कर्म नहीं, भक्ति ही वह शक्ति है जो असंभव को संभव बना सकती है।