राजस्थान के सीकर जिले में इन दिनों आस्था का सैलाब उमड़ रहा है। फाल्गुन मास शुरू होते ही खाटू नगरी श्याममय हो जाती है। सड़कों पर केसरिया ध्वज लहराते नजर आते हैं, ढोल-नगाड़ों की आवाज गूंजती है और हर तरफ “हारे का सहारा, बाबा श्याम हमारा” का जयकारा सुनाई देता है। यह वही समय है जब प्रसिद्ध लक्खी मेला लगता है और हजारों श्रद्धालु खाटू श्याम निशान यात्रा में शामिल होते हैं।
रींगस से खाटू धाम तक करीब 17 से 18 किलोमीटर की यह पैदल यात्रा केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि गहरी आस्था और बलिदान की याद है। भक्त हाथ में ‘निशान’ लेकर नंगे पांव चलते हैं। इस दौरान वे न तो ध्वज को जमीन पर रखते हैं और न ही जूते-चप्पल पहनते हैं। आखिर इस निशान का महत्व क्या है? यह किस कहानी से जुड़ा है? और क्यों हर साल लाखों लोग इसे लेकर यात्रा करते हैं? आइए समझते हैं।
खाटू श्याम निशान यात्रा क्या है?
खाटू श्याम निशान यात्रा हर साल फाल्गुन मास में निकाली जाती है। यह यात्रा रींगस से शुरू होकर खाटू धाम तक जाती है। करीब 18 किलोमीटर की दूरी भक्त पैदल तय करते हैं। साल 2026 में लक्खी मेला 21 फरवरी से 28 फरवरी तक आयोजित हो रहा है, और इसी दौरान यह भव्य निशान यात्रा निकाली जाएगी।
इस यात्रा में शामिल होने वाले श्रद्धालु अपने हाथ में ‘निशान’ यानी ध्वज लेकर चलते हैं। यह ध्वज केसरिया, नारंगी या लाल रंग का होता है। कई भक्त अपनी मन्नत पूरी होने पर यह ध्वज चढ़ाने आते हैं। कुछ लोग परिवार की सुख-समृद्धि के लिए, तो कुछ संतान प्राप्ति या व्यापार में सफलता की कामना लेकर निशान यात्रा में भाग लेते हैं।
‘निशान’ किस बलिदान का प्रतीक है?
खाटू श्याम बाबा को महाभारत काल के वीर बर्बरीक का रूप माना जाता है। कथा के अनुसार, बर्बरीक बहुत बड़े योद्धा थे। उनके पास तीन ऐसे बाण थे, जिनसे वे पूरी सेना को खत्म कर सकते थे। जब महाभारत का युद्ध शुरू होने वाला था, तब भगवान कृष्ण ने उनसे उनका वचन पूछा। बर्बरीक ने कहा कि वे हमेशा कमजोर पक्ष का साथ देंगे।
कहा जाता है कि यदि बर्बरीक युद्ध में शामिल होते, तो युद्ध का संतुलन बिगड़ जाता। तब भगवान कृष्ण ने उनसे उनका शीश दान में मांगा। धर्म की रक्षा के लिए बर्बरीक ने बिना हिचकिचाए अपना सिर दान कर दिया। उनके इस महान बलिदान से प्रसन्न होकर भगवान कृष्ण ने उन्हें वरदान दिया कि कलियुग में वे ‘श्याम’ नाम से पूजे जाएंगे।
निशान चढ़ाने की परंपरा और मन्नत का संबंध
मान्यता है कि खाटू श्याम बाबा के दरबार से कोई खाली हाथ नहीं लौटता। इसलिए पूरे साल यहां श्रद्धालुओं की भीड़ लगी रहती है। जो भी अपनी मनोकामना लेकर बाबा के दरबार में आता है, वह मन्नत मांगता है। मन्नत पूरी होने पर भक्त निशान चढ़ाने की प्रतिज्ञा करते हैं।
खाटू श्याम निशान यात्रा में कई ऐसे श्रद्धालु मिलते हैं जो बताते हैं कि उनकी मनोकामना पूरी हुई, इसलिए वे ध्वज लेकर पैदल यात्रा कर रहे हैं। कोई संतान सुख मिलने पर आया है, तो कोई बीमारी से राहत मिलने पर। कुछ लोग हर साल निशान चढ़ाते हैं, चाहे मन्नत हो या न हो।
क्यों नंगे पांव की जाती है खाटू श्याम निशान यात्रा?
खाटू श्याम निशान यात्रा में शामिल होने वाले भक्त नंगे पांव चलते हैं। इसे तपस्या और समर्पण का प्रतीक माना जाता है। रास्ता लंबा होता है, धूप भी तेज होती है, फिर भी श्रद्धालु पूरे उत्साह से चलते हैं। यात्रा के दौरान ध्वज को जमीन पर नहीं रखा जाता। अगर किसी कारण से विश्राम करना हो, तो ध्वज को कंधे पर या हाथ में ही संभालकर रखा जाता है। यह नियम वर्षों से चले आ रहे हैं और भक्त इन्हें पूरी श्रद्धा से निभाते हैं।
रास्ते में जगह-जगह सेवा शिविर लगाए जाते हैं। यहां पानी, शरबत, भोजन और प्राथमिक चिकित्सा की व्यवस्था होती है। स्थानीय लोग भी इस सेवा में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं। यह यात्रा सामाजिक एकता का भी उदाहरण बनती है।
लक्खी मेले का महत्व और बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या
फाल्गुन मास में लगने वाला लक्खी मेला खाटू धाम की सबसे बड़ी धार्मिक घटनाओं में से एक है। इसे ‘लक्खी’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि यहां लाखों श्रद्धालु पहुंचते हैं। 2026 में भी 21 से 28 फरवरी के बीच भारी भीड़ की संभावना है।
प्रशासन ने भीड़ को संभालने के लिए विशेष इंतजाम किए हैं। सुरक्षा, ट्रैफिक, स्वास्थ्य सेवाएं और साफ-सफाई पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। खाटू श्याम निशान यात्रा के दौरान पूरे इलाके में भक्ति का माहौल रहता है।






