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भगवान की पूजा एक रूप में करें या अनेक में? प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट और सरल जवाब

Written by:Bhawna Choubey
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घर के मंदिर में कई देवी-देवताओं की पूजा करने से क्या सच में अधिक पुण्य मिलता है? वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने इस सवाल पर ऐसा उत्तर दिया, जो आज के समय में हर भक्त के लिए समझना बेहद जरूरी है।
भगवान की पूजा एक रूप में करें या अनेक में? प्रेमानंद महाराज का स्पष्ट और सरल जवाब

भारत के लगभग हर घर में एक छोटा सा मंदिर होता है। उस मंदिर में भगवान के कई रूप होते हैं राम, कृष्ण, शिव, हनुमान, दुर्गा, लक्ष्मी और न जाने कितने देवी-देवता। रोज सुबह-शाम दीप जलता है, अगरबत्ती लगती है और पूरे भाव से पूजा की जाती है। लेकिन मन में एक सवाल अक्सर उठता है, क्या भगवान के जितने ज्यादा रूपों की पूजा करेंगे, उतना ही ज्यादा फल मिलेगा? यही सवाल एक भक्त ने वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज से भी पूछा। सवाल सुनते ही महाराज मुस्कुराए और फिर ऐसा उत्तर दिया।

क्या भगवान के अनेक रूपों की पूजा करने से ज्यादा फल मिलता है?

जब भक्त ने पूछा कि घर के मंदिर में भगवान की कई प्रतिमाएं हैं और माता जी सबकी पूजा करती हैं, तो क्या इससे ज्यादा फल मिलता है, तो प्रेमानंद महाराज ने बहुत शांति से उत्तर दिया। महाराज ने कहा, “भगवान एक ही हैं, उनके रूप अनेक हैं। आप चाहे जितने रूपों की पूजा कर लें, फल एक ही मिलेगा।”

भाव बंटा तो फल भी कम हुआ

प्रेमानंद महाराज ने साफ शब्दों में कहा कि पूजा का असली आधार संख्या नहीं, बल्कि भावना है। अगर मन एक जगह नहीं टिकता, तो पूजा का असर भी कम हो जाता है। हम अगर रोज कई भगवानों की पूजा करते हैं, लेकिन किसी एक से गहरा जुड़ाव नहीं बना पाते, तो वह पूजा केवल एक आदत बनकर रह जाती है। महाराज ने समझाया कि जैसे प्रेम एक इंसान से होता है, वैसे ही भगवान से प्रेम भी एक रूप के साथ ही गहरा होता है।

भगवान एक हैं, रूप अलग-अलग

महाराज ने उदाहरण देकर बात समझाई। उन्होंने कहा कि भगवान अलग-अलग रूपों में दिखते हैं, लेकिन उनकी शक्ति एक ही है। जैसे पानी को कोई जल कहता है, कोई नीर, कोई पानी नाम अलग हैं, लेकिन प्यास सब से एक ही बुझती है। इसी तरह भगवान राम, कृष्ण, शिव, नारायण सब उसी एक परमात्मा के रूप हैं। पूजा किसी भी रूप की हो, अगर भाव सच्चा है, तो भगवान मिलते हैं।

रामकृष्ण परमहंस, तुलसीदास और गोपियों का उदाहरण

प्रेमानंद महाराज ने अपने उत्तर को और साफ करने के लिए संतों का उदाहरण दिया। उन्होंने बताया कि रामकृष्ण परमहंस ने मां काली की पूजा की। उन्होंने मां काली में ही सभी भगवानों को देखा। तुलसीदास जी ने भगवान राम की भक्ति की। उन्हें हर जगह सियाराम ही नजर आए। गोपियों ने श्रीकृष्ण को अपना सब कुछ माना। उन्हें हर जगह श्याम ही दिखाई दिए। इन सभी का भाव एक ही जगह टिका था, इसलिए उनकी भक्ति बहुत गहरी थी और भगवान उन्हें जल्दी मिले।

एक रूप की पूजा क्यों ज्यादा असरदार मानी जाती है

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जब हम भगवान के किसी एक रूप को अपना लेते हैं, तो हमारा मन भटकता नहीं। हम उसी नाम का जप करते हैं, उसी रूप का ध्यान करते हैं और धीरे-धीरे भगवान से एक रिश्ता बन जाता है। हमारे लिए यह समझना जरूरी है कि पूजा दिखावे के लिए नहीं, मन की शांति के लिए होती है। एक रूप की पूजा करने से मन स्थिर रहता है और भक्ति मजबूत होती है।

Disclaimer- यहां दी गई सूचना सामान्य जानकारी के आधार पर बताई गई है। इनके सत्य और सटीक होने का दावा MP Breaking News नहीं करता।