इन दिनों पूरे देशभर में नवरात्रि की धूम देखने को मिल रही है। सुबह से लेकर शाम तक मंदिरों में भीड़ उमड़ रही है। फूलों की, मिठाई की दुकानों में बिक्री बढ़ गई है। माइकों में बजने वाले भजन, कीर्तन से शहर का माहौल भक्तिमय हो जाता है। ऐसे में आज हम आपको मध्य प्रदेश की एक ऐसी मंदिर के बारे में बताएंगे, जहां जाकर आपको अच्छा लगेगा। दरअसल, यह मंदिर रीवा जिले में स्थित है। इसकी पहचान सिर्फ ऐतिहासिक किले और राजघराने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यहां एक ऐसा धाम भी मौजूद है, जो श्रद्धालुओं के लिए आस्था और विश्वास का बड़ा केंद्र है।
दरअसल, इस धार्मिक स्थान का नाम रानी तालाब धाम है, जहां 450 साल पुराना मां कालिका मंदिर स्थित है। नवरात्रि के दिनों में यहां भक्ति का ऐसा वातावरण देखने को मिलता है, मानो पूरा शहर देवी मां के रंग में रंग गया हो।
नवरात्रि में सजा दिव्य दरबार
शारदीय और चैत्र नवरात्रि के मौके पर मां कालिका मंदिर का नजारा ही बदल जाता है। भक्त सुबह से ही यहां पहुंचने लगते हैं और देर रात तक आराधना का सिलसिला चलता रहता है। मान्यता है कि यह स्थान ज्योतिषीय गणना पर आधारित सिद्धपीठ है, जहां नवरात्रि में की गई साधना से सिद्धि प्राप्त होती है। मंदिर के गर्भगृह में विराजमान मां कालिका की मूर्ति इतनी जाग्रत मानी जाती है कि यहां आने वाले हर भक्त की मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।
कैसे हुई प्रतिमा की स्थापना
मां कालिका की प्रतिमा यहां कैसे स्थापित हुई, इसके पीछे एक बेहद दिलचस्प कहानी है। लगभग 450 साल पहले यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था। उस समय घुमक्कड़ समुदाय के लोग बैलगाड़ी से सफर करते हुए इसी रास्ते से गुजरे। उनके पास देवी कालिका की एक अद्भुत प्रतिमा थी। मान्यता थी कि यह प्रतिमा जहां भी रख दी जाएगी, हमेशा के लिए वहीं विराजमान हो जाएगी। यह समुदाय रानी तालाब क्षेत्र में रुका और प्रतिमा को एक इमली के पेड़ के सहारे रख दिया। जब सुबह उन्होंने प्रतिमा को उठाने की कोशिश की, तो प्रतिमा अपनी जगह से हिली ही नहीं। तभी से मां कालिका यहीं स्थापित हो गईं और बाद में इस स्थान पर भव्य मंदिर का निर्माण हुआ।
मान्यता
कहा जाता है कि इस मंदिर के सामने जो विशाल तालाब है, उसकी खुदाई लावाना प्रजाति के लोगों ने की थी। पानी की कमी से परेशान होकर उन्होंने खुद अपने हाथों से तालाब बनवाया। बाद में रीवा राजघराने की महारानी अजब कुमारी यहां पहुंचीं। राखी के मौके पर लावाना समुदाय ने महारानी से राखी बंधवाई और यह तालाब उन्हें भेंट कर दिया। तभी से यह स्थान रानी तालाब कहलाने लगा। आज भी तालाब के बीचोबीच भगवान शिव का प्राचीन मंदिर स्थित है। मान्यता है कि जहां देवी की जाग्रत मूर्ति होती है, वहां जलाशय और वटवृक्ष अवश्य होते हैं।
राजघराने से जुड़ी मान्यता
रीवा राजघराने की श्रद्धा भी इस मंदिर से गहराई से जुड़ी रही है। कहा जाता है कि महाराजा विश्वनाथ सिंह के पुत्र रघुराज सिंह को संतान प्राप्ति नहीं हो रही थी। तब उन्होंने यहां मां कालिका की पूजा-अर्चना की। मान्यता है कि देवी ने स्वप्न में आदेश दिया कि मेरा श्रृंगार करो, तुम्हें संतान की प्राप्ति होगी। इसके बाद राजा ने हीरे-जड़े स्वर्ण आभूषण मां को अर्पित किए और जल्द ही उनकी मनोकामना पूरी हुई। हर नवरात्रि में राजघराने से देवी के श्रृंगार के लिए आभूषण आते थे। वर्षों तक यह परंपरा चली, बाद में मंदिर की देखरेख प्रशासन ने संभाल ली। अब हर साल नवरात्रि के अवसर पर प्रशासन की ओर से मां का श्रृंगार किया जाता है।
चोरों की आंखों की रोशनी चली गई
मंदिर के पुजारियों के मुताबिक, करीब 70-80 साल पहले जब मां के श्रृंगार के लिए आए आभूषणों को चोरों ने चुरा लिया था, तो एक चमत्कार हुआ। आभूषण लेकर बाहर निकलते ही चोरों की आंखों की रोशनी चली गई। अगली सुबह पुजारी पहुंचे, तो चोर गहनों के साथ मंदिर के बाहर खड़े थे। उन्होंने अपराध स्वीकार किया और मां से क्षमा मांगी। मां की कृपा से उनकी आंखों की रोशनी वापस लौट आई।
सिद्धपीठ की पहचान
मां कालिका का यह धाम सिर्फ धार्मिक स्थल ही नहीं, बल्कि सिद्धपीठ भी है। कहा जाता है कि यहां उत्तर दिशा में हनुमान जी और शंकर जी, उत्तर-पूर्व में शिवलिंग, दक्षिण में गणेश जी और पूर्व में काल भैरव विराजमान हैं। गर्भगृह में मां कालिका के साथ-साथ भगवान सूर्य, शीतला माता, अन्नपूर्णा माता, भैरवी और हनुमान जी भी स्थापित हैं। मंदिर के दोनों ओर खोरवा माई और घेंघा माई देवी की रक्षा करती हैं। आज भी नवरात्रि में यहां मेले जैसा माहौल रहता है। भक्त दूर-दराज से आकर मां के दरबार में शीश झुकाते हैं।
(Disclaimer: यहां मुहैया सूचना सिर्फ मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है। MP Breaking News किसी भी तरह की मान्यता, जानकारी की पुष्टि नहीं करता है।)






