नई दिल्ली: भागदौड़ भरी जिंदगी में कई बार लोगों के लिए पूरे विधि-विधान से पूजा-पाठ करना संभव नहीं हो पाता। ऐसे में भगवान शिव की आराधना की एक ऐसी विधि भी है, जिसमें न तो किसी सामग्री की जरूरत होती है और न ही किसी विशेष कर्मकांड की। इसे ‘शिव मानस पूजा’ कहा जाता है, जो केवल मन की शुद्ध भावनाओं और कल्पना पर आधारित है।
यह एक ऐसी भावनात्मक स्तुति है, जिसके माध्यम से भक्त बिना किसी साधन के शिव पूजन का पुण्य फल प्राप्त कर सकता है। शास्त्रों में मानसिक पूजा को शारीरिक पूजा से भी श्रेष्ठ बताया गया है। मान्यता है कि जब कोई भक्त समृद्ध कल्पना और सच्ची श्रद्धा से यह पूजा करता है, तो भगवान शिव अत्यंत प्रसन्न होते हैं और मानसिक रूप से चढ़ाई गई हर वस्तु को प्रत्यक्ष मानकर अपना आशीर्वाद देते हैं।
क्या है मानस पूजा की प्रक्रिया?
शिव मानस पूजा की रचना आदि शंकराचार्य द्वारा की गई मानी जाती है। इसमें भक्त मन ही मन भगवान शिव के लिए सब कुछ कल्पना करता है और उन्हें अर्पित करता है। पूजन का क्रम सामान्य पूजा की तरह ही होता है, लेकिन सब कुछ मानसिक स्तर पर होता है।
सबसे पहले भक्त मन में यह कल्पना करता है कि भगवान शिव रत्नों से जड़े एक भव्य सिंहासन पर विराजमान हैं। फिर वह उन्हें हिमालय के शीतल और पवित्र जल से स्नान कराता है। इसके बाद रत्नजड़ित दिव्य वस्त्र, केसर-कस्तूरी से बना चंदन का लेप और तिलक अर्पित करने की कल्पना की जाती है।
फूल से लेकर भोग तक, सब कुछ मानसिक
शारीरिक पूजा की तरह ही मानस पूजा में भी पुष्प और भोग का विधान है, लेकिन यह सब कल्पना में होता है। भक्त जूही, चंपा और बिल्वपत्र जैसे पुष्पों की माला बनाकर शिव को अर्पित करता है। सुगंधित धूप और दीप जलाकर उनकी आरती उतारता है।
इसके बाद स्वर्ण पात्रों में खीर, दही, पांच तरह के व्यंजन, फल, शरबत और कपूर से सुगंधित शीतल जल का भोग लगाने का ध्यान किया जाता है। अंत में भगवान को ताम्बूल (पान) अर्पित किया जाता है। भक्त यह भावना करता है कि प्रभु उसकी इस मानसिक सेवा को स्वीकार करें।
स्वयं को शिव में विलीन करने की भावना
इस पूजा का सबसे गहरा और दार्शनिक पक्ष वह है, जहां भक्त स्वयं को पूरी तरह से शिव को समर्पित कर देता है। वह भावना करता है कि ‘हे प्रभु, मेरी आत्मा आप स्वयं हैं, मेरी बुद्धि माता पार्वती हैं और मेरे प्राण आपके गण हैं। यह शरीर आपका मंदिर है और मैं जो भी विषय भोग करता हूं, वह आपकी ही पूजा है।’
इस स्तुति के अनुसार, भक्त का सोना समाधि के समान है, उसका चलना-फिरना आपकी परिक्रमा है और उसके मुख से निकला हर शब्द आपका स्तोत्र है। इस प्रकार, भक्त द्वारा किया गया हर कर्म जाने-अनजाने में शिव की आराधना ही बन जाता है।
अपराधों के लिए क्षमा याचना
पूजा के अंत में भक्त अपने द्वारा किए गए सभी अपराधों के लिए क्षमा मांगता है। वह प्रार्थना करता है, ‘हे प्रभु! मैंने जाने-अनजाने में हाथ, पैर, वाणी, शरीर, कर्म, कान, आंख या मन से जो भी पाप किए हों, उन सभी के लिए मुझे क्षमा करें। हे करुणा के सागर महादेव, आपकी जय हो।’ यह समर्पण और क्षमा का भाव ही मानस पूजा का सार है।
यहां पढ़ें भोलेनाथ की मानस पूजा का स्त्रोत
रत्नै: कल्पितमासनं हिमजलै: स्नानं च दिव्याम्बरं नानारत्नविभूषितं मृगमदामोदांकितं चन्दनम् ।
जातीचम्पकबिल्वपत्ररचितं पुष्पं च धूपं तथा दीपं देव दयानिधे पशुपते हृत्कल्पितं गृह्यताम् ।। १ ।।
सौवर्णे नवरत्नखण्डरचिते पात्रे घृतं पायसं भक्ष्यं पंचविधं पयोदधियुतं रम्भाफलं पानकम् ।
शाकानामयुतं जलं रुचिकरं कर्पूरखण्डोज्ज्वलं ताम्बूलं मनसा मया विरचितं भक्त्या प्रभो स्वीकुरु ।। २।।
छत्रं चामरयोर्युगं व्यजनकं चादर्शकं निर्मलं वीणाभेरिमृदंगकाहलकला गीतं च नृत्यं तथा ।
साष्टांगं प्रणति: स्तुतिर्बहुविधा ह्येतत्समस्तं मया संकल्पेन समर्पितं तव विभो पूजां गृहाण प्रभो ।। ३ ।।
आत्मा त्वं गिरिजा मति: सहचरा: प्राणा: शरीरं गृहं पूजा ते विषयोपभोगरचना निद्रा समाधिस्थिति: ।
संचार: पदयो: प्रदक्षिणविधि: स्तोत्राणि सर्वा गिरो यद्यत्कर्म करोमि तत्तदखिलं शम्भो तवाराधनम् ।। ४ ।।
करचरणकृतं वाक्कायजं कर्मजं वा श्रवणनयनजं वा मानयं वापराधम् ।
विहितमविहितं वा सर्वमेतत्क्षमस्वजय जय करुणाब्धे श्रीमहादेव शम्भो ।। ५ ।।
॥ इति श्रीमद् शंकराचार्य विरचिता शिव मानस पूजा समाप्ता ॥
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