यहां माता को चढ़ता है झींगा मछली का भोग! ठनठनिया काली मंदिर की अनोखी परंपरा चौंकाएगी

कोलकाता के ठनठनिया काली मंदिर में माता सिद्धेश्वरी को झींगा मछली का भोग चढ़ाया जाता है। यह अनोखी परंपरा तांत्रिक पूजा से जुड़ी है, जिसके पीछे आस्था, रहस्य और चमत्कार की दिलचस्प कहानी छिपी है।
यहां माता को चढ़ता है झींगा मछली का भोग

भारत में देवी-देवताओं की पूजा के कई रूप देखने को मिलते हैं। कहीं दूध से अभिषेक होता है, तो कहीं फूलों से आराधना। लेकिन कुछ मंदिर ऐसे भी हैं, जहां परंपराएं आम सोच से बिल्कुल अलग होती हैं। ऐसा ही एक मंदिर है कोलकाता का ठनठनिया काली मंदिर, जहां माता को झींगा मछली का भोग लगाया जाता है।

यह सुनकर कई लोग हैरान हो जाते हैं, लेकिन यहां के श्रद्धालुओं के लिए यह सामान्य और गहरी आस्था से जुड़ी परंपरा है। ठनठनिया काली मंदिर की यह परंपरा न केवल अनोखी है, बल्कि इसके पीछे कई धार्मिक मान्यताएं और रहस्य भी जुड़े हुए हैं।

ठनठनिया काली मंदिर का इतिहास और नाम का रहस्य

कोलकाता के बिधान सरणी इलाके में स्थित ठनठनिया काली मंदिर एक प्राचीन शक्तिपीठ माना जाता है। कहा जाता है कि इस मंदिर का निर्माण सन् १७०३ में तांत्रिक उदय नारायण ब्रह्मचारी ने करवाया था। यहां माता काली की पूजा माता सिद्धेश्वरी के रूप में की जाती है।

इस मंदिर के नाम के पीछे भी एक रोचक कहानी है। पुराने समय में जब यह इलाका घने जंगलों से घिरा हुआ था, तब यहां से गुजरने वाले लोगों को मंदिर की घंटियों की ‘ठन-ठन’ की आवाज सुनाई देती थी। इसी वजह से इस स्थान का नाम ठनठनिया पड़ गया।

क्यों लगाया जाता है माता को झींगा मछली का भोग?

ठनठनिया काली मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां माता को झींगा मछली का भोग लगाया जाता है। यह परंपरा तांत्रिक पूजा पद्धति से जुड़ी हुई है, जहां देवी को मांसाहारी भोग अर्पित करना सामान्य माना जाता है।

मान्यता के अनुसार, एक समय प्रसिद्ध संत रामकृष्ण परमहंस ने अपने एक शिष्य के स्वास्थ्य के लिए माता से प्रार्थना की थी। उस दौरान उन्होंने माता को नारियल के साथ झींगा मछली का भोग चढ़ाया। कहा जाता है कि इसके बाद शिष्य का स्वास्थ्य ठीक हो गया। इसी घटना के बाद से यहां झींगा मछली का भोग चढ़ाने की परंपरा शुरू हो गई, जो आज भी जारी है। यह परंपरा इस मंदिर को अन्य मंदिरों से अलग बनाती है।

कब लगता है शाकाहारी और कब मांसाहारी भोग?

हालांकि पूरे साल ठनठनिया काली मंदिर में माता को मांसाहारी भोग चढ़ाया जाता है, लेकिन कुछ विशेष दिनों पर यहां परंपरा बदल जाती है। काली चौदस और फलहारिणी अमावस्या के दिन माता को केवल शाकाहारी भोग ही लगाया जाता है। इन खास अवसरों पर भक्त बड़ी संख्या में मंदिर पहुंचते हैं और माता के दर्शन करते हैं। यह परंपरा दर्शाती है कि मंदिर में पूजा के अलग-अलग नियम और मान्यताएं हैं, जिनका पालन श्रद्धा के साथ किया जाता है।

तांत्रिक परंपरा और आस्था का गहरा संबंध

ठनठनिया काली मंदिर की पूजा पद्धति तांत्रिक परंपरा से जुड़ी हुई है। तांत्रिक पूजा में देवी को शक्ति का रूप माना जाता है और उन्हें विशेष प्रकार के भोग अर्पित किए जाते हैं। यहां की पूजा विधि आम मंदिरों से अलग है, लेकिन इसमें श्रद्धा और विश्वास की कोई कमी नहीं है। भक्त मानते हैं कि माता सिद्धेश्वरी उनकी हर मनोकामना पूरी करती हैं।

Disclaimer- यहां दी गई सूचना सामान्य जानकारी के आधार पर बताई गई है। इनके सत्य और सटीक होने का दावा MP Breaking News न्यूज़ नहीं करता।

Bhawna Choubey
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