होली का त्योहार नजदीक आते ही बाजारों में रंगों की रौनक बढ़ जाती है, लेकिन इन रंगों में मिले केमिकल अक्सर त्वचा और आंखों के लिए हानिकारक साबित होते हैं। इसी समस्या का समाधान मध्य प्रदेश के सागर जिले की महिलाओं ने खोज निकाला है। यहां मॉलथोन विकासखंड में स्वयं-सहायता समूहों से जुड़ी महिलाएं फूलों और सब्जियों से पूरी तरह प्राकृतिक और सुरक्षित गुलाल तैयार कर रही हैं।
यह पहल न केवल सुरक्षित होली का संदेश दे रही है, बल्कि ग्रामीण महिलाओं के लिए घर बैठे रोजगार का एक बड़ा अवसर भी बन गई है। राष्ट्रीय ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत संगठित इन महिलाओं का उद्देश्य रासायनिक दुष्प्रभावों से मुक्त रंग बनाना है, जो हर किसी के लिए सुरक्षित हों।
कैसे तैयार होता है यह प्राकृतिक गुलाल?
इन हर्बल रंगों को बनाने की प्रक्रिया पूरी तरह से पारंपरिक और प्राकृतिक है। महिलाएं स्थानीय रूप से उपलब्ध संसाधनों का बेहतरीन इस्तेमाल कर रही हैं।

विभिन्न रंगों के लिए सामग्री:
- पीला और केसरिया रंग: इसके लिए टेसू (पलाश) और सेमल के फूलों को इकट्ठा कर धूप में सुखाया जाता है। सूखने के बाद इन्हें पीसकर चमकीला पीला और केसरिया रंग तैयार होता है।
- हरा रंग: पालक और अन्य औषधीय पत्तियों के अर्क का उपयोग करके प्राकृतिक हरा गुलाल बनाया जाता है।
- लाल और गुलाबी रंग: चुकंदर को सुखाकर और पीसकर मनमोहक लाल और गुलाबी रंग तैयार किया जाता है।
सभी सामग्रियों को अच्छी तरह सुखाने के बाद बारीक पीसा जाता है और फिर महीन कपड़े से छानकर मुलायम गुलाल का रूप दिया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया में किसी भी तरह के सिंथेटिक रसायन या हानिकारक तत्व का इस्तेमाल नहीं किया जाता है।
महिलाओं के लिए आर्थिक सशक्तिकरण का जरिया
पिछले साल इन महिलाओं द्वारा बनाए गए हर्बल गुलाल को बाजार में काफी पसंद किया गया था। ग्राहकों से मिली अच्छी प्रतिक्रिया को देखते हुए इस वर्ष उत्पादन को और भी बड़े पैमाने पर किया जा रहा है। महिलाएं इसे आकर्षक पैकिंग में स्थानीय बाजारों और मेलों में बेच रही हैं।
इस काम से समूह से जुड़ी महिलाओं की आय में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह पहल उन्हें घर पर रहते हुए आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बना रही है। यह न केवल ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती दे रहा है, बल्कि महिलाओं के आत्मविश्वास को भी बढ़ा रहा है, जो स्थानीय संसाधनों का उपयोग करके एक सफल उद्यम चला रही हैं।






