अंतरराष्ट्रीय तेंदुआ दिवस, जो पूरी दुनिया में वन्यजीव संरक्षण का संदेश देने के लिए मनाया जाता है, इस बार मध्य प्रदेश के लिए बेहद दुखद साबित हुआ। जहां एक ओर लोग तेंदुओं को बचाने की बात कर रहे थे, वहीं दूसरी ओर सतना और मैहर से आई खबरों ने पूरे माहौल को गमगीन कर दिया।
एक ही दिन में दो तेंदुओं की मौत की घटनाएं सामने आईं। ये सिर्फ हादसे नहीं हैं, बल्कि एक बड़ी चेतावनी हैं। जंगलों के राजा माने जाने वाले ये खूबसूरत जीव अब अपने ही रास्तों पर सुरक्षित नहीं हैं। सवाल यह उठता है कि क्या विकास की रफ्तार ने जंगलों के इन बाशिंदों के लिए रास्ते बंद कर दिए हैं?
सतना में रेलवे ट्रैक बना मौत का जाल
सतना जिले के उचेहरा वन परिक्षेत्र में जो तस्वीर सामने आई, उसने हर किसी को झकझोर कर रख दिया। रेलवे ट्रैक के पास एक ढाई साल की मादा तेंदुए का शव पड़ा मिला। आसपास खून फैला हुआ था और शरीर पर गंभीर चोटों के निशान साफ दिखाई दे रहे थे।
तेंदुआ शायद भोजन की तलाश में भटकते हुए रेलवे ट्रैक तक पहुंच गया होगा। लेकिन यहां सवाल यह है कि क्या ऐसे संवेदनशील इलाकों में वन्यजीवों की सुरक्षा के लिए पर्याप्त इंतजाम किए गए हैं? रेलवे ट्रैक अब सिर्फ इंसानों के लिए नहीं, बल्कि वन्यजीवों के लिए भी ‘डेथ कॉरिडोर’ बनते जा रहे हैं। सतना की यह घटना उसी का एक उदाहरण है।
मैहर में हाईवे बना खतरनाक ‘डेथ कॉरिडोर’
इसी दिन मैहर वनमंडल से भी एक और दिल दहला देने वाली खबर आई। मैहर-कटनी नेशनल हाईवे पर एक डेढ़ साल की मादा तेंदुआ मृत पाई गई। उसका शव सड़क के किनारे पड़ा था, जिससे साफ है कि यह एक सड़क दुर्घटना का मामला है।
तेंदुए अक्सर रात के समय सड़क पार करते हैं और तेज रफ्तार वाहनों के कारण हादसे का शिकार हो जाते हैं। मैहर की यह घटना बताती है कि कैसे विकास के नाम पर बनाए गए हाईवे अब वन्यजीवों के लिए खतरनाक साबित हो रहे हैं।
इन दोनों घटनाओं के बीच एक और अहम बात सामने आई है। मैहर के शारदा माता मंदिर क्षेत्र में तेंदुए और उसके शावकों के पगमार्क मिले हैं। यह संकेत है कि तेंदुए अब जंगलों से निकलकर इंसानी बस्तियों की ओर बढ़ रहे हैं।






