ये पब्लिक है कि मानती नहीं, पुलिसिया डंडे से खदेड़े गए लोग

ये पब्लिक है कि मानती नहीं, पुलिसिया डंडे से खदेड़े गए लोग

सीहोर/अनुराग शर्मा
कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुवे सीहोर जिले में 23 मार्च से लॉक टाउन के आदेश है। जिला प्रशासन, राज्य सरकार, केंद्र सरकार लगातार लोगों से घरों के अंदर रहने की अपील कर रहा है, लेकिन पब्लिक है कि मानती नहीं। ऐसे लोगों को सुधारने के लिये अब पुलिस ने अपने डंडे से काम लिया है। हालांकि ये डंडे लोगों पर चलाए नहीं गए, लेकिन डंडों से पुलिस ने बाहर घूम रहे लोगों को खदेड़ा।

कलेक्टर अजय गुप्ता ने भी लगातार लोगों से घरों में रहने की अपील की है। लेकिन लॉक डाउन की घोषणा के दूसरे दिन कई लोग लापरवाही से अपने घरों से रोज की भांति सड़कों ऐसे निकले जैसे चहलकदमी करने निकले हों। हालांकि इस दौरान इक्का दुक्का दुकानों को छोड़कर बाजार बंद रहा लेकिन जनता के लिए लॉक डाउन जैसे किसी उत्सव की तरह हो गया है। बिना किसी आवश्यक कार्य के लोग अपने घरों से तफरीह करने निकल रहे हैं। ऐसे में तमाम समझाइश के बाद भी जब लोग नहीं मान रहे हैं तो पुलिस को उन्हें डंडों से धमकाते हुए घर भेजना पड़ा।

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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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