महाकाल के आंगन में हर त्यौहार बहुत ही धूमधाम के साथ मनाया जाता है। हिंदू नववर्ष गुड़ी पड़वा का त्यौहार भी यहां धूमधाम से मनाने की तैयारी चल रही है। इस खास मौके पर मंदिर के शिखर पर ब्रह्म ध्वज लहराया जाएगा।

तकरीबन 2000 साल पहले उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने इस परंपरा की शुरुआत की थी। यह परंपरा अविस्मरणीय बनी रहे उसके लिए कुछ सिक्के भी जारी किए गए थे। यह आज भी महिदपुर के अश्विनी शोध संस्थान में रखे हुए हैं।

महाकाल के शिखर पर ब्रह्म ध्वज

ब्रह्म ध्वज को साहस, शक्ति और विजय का प्रतीक माना गया है। केसरिया रंग के इस ध्वज में दो पताका रहती है और मध्य में सूर्य बना होता है। इसे चतुर्दिक विजय के प्रतीक के तौर पर देखा जाता है। इतिहासकारों के मुताबिक सम्राट विक्रमादित्य चैत्र शुक्ल प्रतिपदा पर इसी ब्रह्म ध्वज का आरोहण करते थे।

जारी की थी मुद्रा

सम्राट विक्रमादित्य ने इस परंपरा से जुड़ी उज्जयिनी मुद्रा जारी की थी। इस मुद्रा में एक तरफ भगवान शिव सूर्य दंड के साथ दिखाई देते हैं और दूसरी तरफ उज्जयिनी का मार्का बना हुआ है। उस समय इस मुद्रा की काफी कीमत थी और उज्जैन विदेशी व्यापार का बड़ा और प्रमुख केंद्र हुआ करता था।

अलग-अलग अवसरों पर विक्रमादित्य ने अनेक मुद्राएं जारी की थी। उज्जयिनी मुद्रा के मध्य में प्लस का चिन्ह होता था और चार भुजाओं पर गोलाकार आकृति निर्मित होती थी। इसका अर्थ यह था कि उज्जैन पृथ्वी के मध्य में स्थित है और जल, वायु और जमीनी मार्ग से दूसरे देशों से जुड़ा हुआ है।

मुख्यमंत्री ने की पहल

सम्राट विक्रमादित्य के इस ब्रह्म ध्वज के आरोहण की परंपरा को पुनर्जीवित करने की पहल मुख्यमंत्री डॉक्टर मोहन यादव ने की है। उन्होंने इसे महत्वपूर्ण मानते हुए ज्योतिर्लिंग महाकाल के शिखर और शहर के प्रमुख भवनों पर इसे लहराने का निर्णय लिया है।

आप भी चढ़वा सकते हैं ध्वज

सबसे खास बात यह है कि यह ध्वज आम भक्त भी मंदिर के शिखर पर चढ़वा सकते हैं। इसके लिए उन्हें कार्यालय से 1100 रुपए की रसीद कटवानी होगी। इस रसीद के अलावा ध्वज खरीदने, इसकी पूजा करने, अखाड़े की भेंट और शिखर पर चढ़कर ध्वज लगाने वाले कर्मचारी का भुगतान अलग से करना पड़ता है। तकरीबन 3 हजार के खर्च के साथ ये ध्वज शिखर पर आरोहित करवाया जा सकता है।