शिप्रा नदी को मोक्षदायिनी के नाम से पहचाना जाता है मोक्षदायिनी के नाम से पहचाना जाता है। अपने पापों का नाश करने और पूर्वजों को मोक्ष दिलाने के उद्देश्य से कई लोग यहां स्नान दान और धार्मिक अनुष्ठान करने के लिए पहुंचते हैं। पुण्य सलीला शिप्रा के शुद्धिकरण का मुद्दा लंबे समय से उठ रहा है। इस पर करोड़ों रुपए भी खर्च किए जा रहे हैं लेकिन अवैध निर्माण और उनसे निकलने वाली गंदगी शुद्धिकरण की इस कोशिश को ठेंगा दिखा रही है।
दरअसल शिप्रा नदी के किनारे ग्रीन बेल्ट और सिंहस्थ की संरक्षित जमीन पर लगातार अवैध निर्माण देखने को मिल रहे हैं। लोग धड़ल्ले से यहां होटल, रेस्टोरेंट, आश्रम, मठ और कॉलोनी का निर्माण कर रहे हैं। लगभग 200 से अधिक अवैध निर्माण को लेकर याचिका हाईकोर्ट में दायर की गई है। इस पर अब कोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है।
शिप्रा शुद्धिकरण पर हाईकार्ट सख्त
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर की खंड पीठ ने इस मामले में उज्जैन नगर निगम को तलब किया है। कोर्ट ने ये निर्देश दिए हैं कि नदी के किनारे 200 मीटर के दायरे में जो भी अतिक्रमण हुए हैं, उस बारे में जानकारी दें। इतना ही नहीं उन्हें हटाने के कार्रवाई पर 15 जून तक जवाब पेश करने को भी कहा है।
दायर की गई थी याचिका
साल 2023 में उज्जैन के रहने वाले सत्यनारायण सोमानी ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। इसमें बताया गया था कि शिप्रा नदी के किनारे 100 से 200 मीटर के दायरे में आश्रम, स्कूल, होटल, कॉलोनी और मठ का अवैध निर्माण किया गया है। इन निर्माणों से जो सीवरेज निकल रहा है वह सीधा नदी में मिल रहा है, जिससे नदी का पानी प्रदूषित हो रहा है।
कोर्ट का क्या कहना
इस मामले में लगातार सुनवाई चल रही थी जिसके बाद नगर निगम को यह निर्देश दिए गए हैं कि 15 जून तक सभी अतिक्रमणों की सूची तैयार करवाई जाए। यह सूची तैयार होगी तब तक किसी भी तरह की व्यावसायिक गतिविधि संचालित ना होने देने के निर्देश भी जारी किए गए हैं। कोर्ट की ओर से नदी निधि विकास योजना से जुड़ी रिपोर्ट मांगी गई है।
याचिकाकर्ता के वकील बलदीप सिंह गांधी के मुताबिक हाई कोर्ट में अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि नदी के पास किसी भी व्यावसायिक रिसॉर्ट का निर्माण स्वीकार नहीं किया जा सकता। अब मामले को सुनवाई 15 जून को की जाने वाली है। इस दौरान नगर निगम को अतिक्रमण हटाने पर क्या कार्रवाई की गई है। इस बारे में जानकारी देनी होगी।






