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राष्ट्रीय शालेय फुटबॉल प्रतियोगिता खत्म होने के तीन महीने बाद भी व्यापारियों का भुगतान नहीं, कांग्रेस ने लगाये भ्रष्टाचार के आरोप, भाजपा ने जांच की बात कही

Reported by:Brijesh Shrivastav|Edited by:Atul Saxena
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विभाग और आयोजन समिति की मनमानी कार्यशैली के चलते प्रतियोगिता के बिल फिलहाल खटाई में पड़े हुए हैं और भुगतान अटका हुआ है। नियमों के विरुद्ध खर्च और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी अब जांच का विषय बनती जा रही है।
राष्ट्रीय शालेय फुटबॉल प्रतियोगिता खत्म होने के तीन महीने बाद भी व्यापारियों का भुगतान नहीं, कांग्रेस ने लगाये भ्रष्टाचार के आरोप, भाजपा ने जांच की बात कही

उमरिया में 69 वीं राष्ट्रीय शालेय फुटबॉल प्रतियोगिता को खत्म हुए तीन महीने बीत चुके हैं, लेकिन अब तक इस आयोजन से जुड़े स्थानीय सहयोगी प्रतिष्ठानों का भुगतान नहीं हो पाया है। होटल, टेंट, कैटरिंग और परिवहन से जुड़े व्यापारी अपने बिलों को लेकर दर-दर भटक रहे हैं। वहीं अब यह मामला राजनीतिक तकरार का रूप लेता जा रहा है।

उमरिया जिले में आयोजित 69 वीं राष्ट्रीय शालेय फुटबॉल प्रतियोगिता को उस वक्त जिले की बड़ी उपलब्धि बताया गया था। देशभर से आई टीमों, भव्य उद्घाटन और व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन ने अपनी पीठ खुद थपथपाई थी।
लेकिन आज, तीन महीने बाद, हकीकत कुछ और ही बयां कर रही है।

प्रतियोगिता के दौरान सेवाएं देने वाले स्थानीय होटल संचालक, टेंट हाउस, भोजन प्रदाता और अन्य सहयोगी प्रतिष्ठान अब तक अपने भुगतान का इंतजार कर रहे हैं। कई व्यापारियों का कहना है कि लाखों रुपए के बिल प्रशासन के पास जमा हैं, लेकिन न तो कोई स्पष्ट जवाब मिल रहा है और न ही भुगतान की समयसीमा। इधर इस मामले ने अब राजनीतिक रंग भी पकड़ लिया है।

भाजपा ने कही जांच की बात 

भाजपा ने पहले इस आयोजन में फर्जी बिलिंग और वित्तीय गड़बड़ी की आशंका जताते हुए जांच की मांग की थी। भाजपा नेताओं का आरोप है कि प्रतियोगिता के नाम पर सरकारी राशि का दुरुपयोग हुआ है। भाजपा की शिकायत के बाद अब कांग्रेस भी हमलावर हो गई है। कांग्रेस ने प्रदेश के प्रमुख सचिव के हालिया बयानों का हवाला देते हुए सीधे तौर पर उमरिया कलेक्टर पर गंभीर आरोप लगाए हैं।

कांग्रेस ने दोषियों पर कार्रवाई की मांग की 

कांग्रेस नेताओं का कहना है कि जब शासन स्तर पर ही अनियमितताओं की बात सामने आ रही है, तो जिले के जिम्मेदार अधिकारी कैसे बच सकते हैं। कांग्रेस ने मांग की है कि पूरे फुटबॉल आयोजन की निष्पक्ष जांच कराई जाए, सभी वित्तीय लेन-देन की ऑडिट हो और जो भी दोषी पाए जाएं, उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई की जाए। साथ ही स्थानीय व्यापारियों के लंबित भुगतान को तत्काल जारी करने की भी मांग की गई है।

बजट 32 लाख खर्च कर दिए 52 लाख!

आयोजन से जुड़े लोग बताते हैं कि प्रतियोगिता के आयोजन के लिए शासन द्वारा लगभग 32 लाख रुपये की राशि स्वीकृत की गई थी, लेकिन हैरानी की बात यह है कि महज तीन दिन के इस आयोजन में विभाग लगभग 52 लाख रुपये खर्च कर दिए गए। इस पूरी प्रक्रिया में सबसे बड़ा माइनस पॉइंट यह सामने आया है कि जिन कार्यों के लिए वर्क ऑर्डर जारी किए गए, उनमें टेंडर प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया। नियमों को ताक पर रखकर सीधे मनमाने ढंग से कार्य आवंटित किए गए, जिससे अब आयोजन से जुड़े कई बिलों पर सवाल खड़े हो गए हैं।

व्यापारियों के बिल खटाई में पड़े

बताया जा रहा है कि विभाग और आयोजन समिति की मनमानी कार्यशैली के चलते प्रतियोगिता के बिल फिलहाल खटाई में पड़े हुए हैं और भुगतान अटका हुआ है। नियमों के विरुद्ध खर्च और प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी अब जांच का विषय बनती जा रही है। यदि मामले की निष्पक्ष जांच होती है, तो कई जिम्मेदारों पर कार्रवाई तय मानी जा रही है।

फिलहाल प्रशासनिक स्तर पर चुप्पी साधी हुई है, लेकिन सवाल यह है कि आखिर अतिरिक्त 20 लाख रुपये कैसे और किन आधारों पर खर्च कर दिए गए। सवाल यही है कि जिस आयोजन को जिले की शान बताया गया था, वही अब प्रशासनिक लापरवाही और राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ता नजर आ रहा है। अब देखना होगा कि शासन इस मामले में कितनी जल्दी और कितनी पारदर्शिता से कार्रवाई करता है और व्यापरियों को कब तक भुगतान होता है।