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एक बार फिर बाघों की सुरक्षा पर उठे सवाल, बाघों की सुरक्षा एवं गिनती वाला कैमरा हुआ गायब

Reported by:Brijesh Shrivastav|Edited by:Atul Saxena
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ट्रैप कैमरे जंगल में इस तरह लगाए जाते हैं कि जैसे ही कोई वन्य जीव सामने से गुजरता है, उसकी तस्वीर और वीडियो अपने आप रिकॉर्ड हो जाती है।
एक बार फिर बाघों की सुरक्षा पर उठे सवाल, बाघों की सुरक्षा एवं गिनती वाला कैमरा हुआ गायब

tiger security and counting cameras stolen

घने जंगल की सुबह आम दिनों जैसी ही थी। पेड़ों के बीच धूप छनकर ज़मीन पर पड़ रही थी और दूर कहीं पक्षियों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। लेकिन घुनघुटी वन परिक्षेत्र के मझगवां बीट में उस दिन कुछ अलग था। बाघों की गतिविधियों पर नजर रखने के लिए लगाया गया एक ट्रैप कैमरा अपनी जगह से गायब था।

कहां से हुआ कैमरा चोरी?

मामला कक्ष क्रमांक आरएफ 235, वन परिक्षेत्र मझगवां का है। यह क्षेत्र बाघों की आवाजाही के लिए जाना जाता है, इसलिए यहां विशेष निगरानी रखी जाती है। 1 से 2 फरवरी के बीच पूरे घुनघुटी वन परिक्षेत्र में 135 ट्रैप कैमरे लगाए गए थे, जिनमें से 20 कैमरे मझगवां क्षेत्र में स्थापित किए गए थे। इन्हीं में से एक कैमरा अचानक लापता मिला।

पहले तलाश, फिर चोरी की पुष्टि

नियमित निरीक्षण के दौरान वनकर्मियों ने देखा कि एक कैमरा पेड़ पर नहीं है। शुरुआत में उन्हें लगा कि शायद तेज हवा, जानवरों की हलचल या तकनीकी कारण से कैमरा गिर गया हो। आसपास के इलाके में कई घंटों तक खोजबीन की गई। लेकिन जब कैमरे का कोई सुराग नहीं मिला, तब चोरी की आशंका मजबूत हो गई।

थाने पहुंचा मामला

आखिरकार वन विभाग ने थाना पाली में शिकायत दर्ज कराई। अपराध क्रमांक 72/26 धारा 303(2) बीएनएस के तहत मामला कायम किया गया है। पुलिस अज्ञात आरोपी की तलाश में जुट गई है। घुनघुटी रेंजर अर्जुन सिंह ने बताया कि चोरी हुए ट्रैप कैमरे की कीमत करीब 10 हजार रुपये है और यह बाघों की गणना के लिए बेहद महत्वपूर्ण था।

क्यों जरूरी होते हैं ट्रैप कैमरे?

ट्रैप कैमरे जंगल में इस तरह लगाए जाते हैं कि जैसे ही कोई वन्य जीव सामने से गुजरता है, उसकी तस्वीर और वीडियो अपने आप रिकॉर्ड हो जाती है। बाघों की धारियों का पैटर्न हर बाघ में अलग होता है। इन्हीं तस्वीरों के आधार पर वैज्ञानिक तरीके से उनकी पहचान और गिनती की जाती है। एक कैमरे की कमी भी डेटा को प्रभावित कर सकती है। इसलिए यह सिर्फ एक उपकरण की चोरी नहीं, बल्कि वन्यजीव संरक्षण की प्रक्रिया में व्यवधान है।

चोरों के हौसले बुलंद

जंगल के भीतर, सीमित पहुंच वाले इलाके से सरकारी उपकरण चोरी हो जाना कई सवाल खड़े करता है। क्या यह किसी स्थानीय शरारती तत्व का काम है, या फिर किसी को इन उपकरणों की जानकारी पहले से थी? फिलहाल वन विभाग सतर्क हो गया है। बाघों की निगरानी के साथ अब ट्रैप कैमरों की सुरक्षा भी प्राथमिकता बन गई है। जंगल की खामोशी में अब सिर्फ बाघों की चाल नहीं, बल्कि चोर की तलाश भी जारी है।

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Atul Saxena
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena
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