प्रयागराज: उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था में फैले भ्रष्टाचार पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अब तक का सबसे कड़ा रुख अपनाया है। एक ऐतिहासिक फैसले में अदालत ने राज्य सरकार को पूरे प्रदेश में नियुक्त सहायक अध्यापकों के दस्तावेजों की व्यापक जांच का आदेश दिया है। कोर्ट ने साफ कहा है कि फर्जी प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी पाने वाले शिक्षकों को न सिर्फ बर्खास्त किया जाए, बल्कि उनसे अब तक दी गई पूरी सैलरी भी वसूली जाए।
यह पूरा आदेश न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने एक ऐसी शिक्षिका की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया, जो 15 साल तक फर्जी दस्तावेजों पर नौकरी करती रही। कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए पूरे सिस्टम की सफाई का निर्देश जारी किया है।
6 महीने में पूरी करनी होगी जांच
हाईकोर्ट ने प्रदेश के बेसिक शिक्षा विभाग के प्रमुख सचिव को यह जांच 6 महीने के भीतर पूरी करने का निर्देश दिया है। अदालत ने अपनी टिप्पणी में कहा कि यह फर्जीवाड़ा शिक्षा विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत या लापरवाही के बिना संभव नहीं है। इसलिए, जांच में दोषी पाए जाने वाले अधिकारियों के खिलाफ भी सख्त दंडात्मक और अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए।
क्या है 15 साल पुराने फर्जीवाड़े का मामला?
यह मामला देवरिया जिले की एक सहायक अध्यापिका गरिमा सिंह से जुड़ा है। गरिमा को जुलाई 2010 में सलेमपुर के एक उच्चतर प्राथमिक विद्यालय में नियुक्ति मिली थी। वह लगभग 15 वर्षों से सेवा दे रही थीं। साल 2025 में हुई एक शिकायत के बाद जब STF और अन्य अधिकारियों ने जांच की, तो एक चौंकाने वाला खुलासा हुआ।
जांच में पता चला कि गरिमा सिंह ने जिन शैक्षिक और निवास प्रमाण पत्रों के आधार पर नौकरी हासिल की थी, वे असल में किसी और व्यक्ति के थे। इस धोखाधड़ी के सामने आने के बाद अगस्त 2025 में देवरिया के बेसिक शिक्षा अधिकारी (BSA) ने उनकी नियुक्ति रद्द कर दी थी।
कोर्ट ने खारिज की बर्खास्त शिक्षिका की याचिका
गरिमा सिंह ने अपनी बर्खास्तगी को हाईकोर्ट में चुनौती दी। उनके वकील ने दलील दी कि वह 15 साल से बिना किसी शिकायत के सेवा दे रही हैं और नियुक्ति के समय उनके दस्तावेजों का सत्यापन हुआ था। हालांकि, अदालत ने इन दलीलों को पूरी तरह खारिज कर दिया।
“धोखाधड़ी से लाभ उठाने वाला व्यक्ति किसी भी तरह की रियायत या जांच का हकदार नहीं है।”- न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान
अदालत ने कहा कि छात्रों का हित सर्वोपरि है और अयोग्य शिक्षकों द्वारा दी जाने वाली शिक्षा से समझौता नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता जताई कि कैसे फर्जी दस्तावेजों के सहारे सालों-साल लोग नौकरी कर रहे हैं, जो व्यवस्था पर एक गंभीर सवाल खड़ा करता है। इस फैसले से शिक्षा विभाग में बड़े स्तर पर उथल-पुथल की संभावना है।





