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वाहनों और सोशल मीडिया से हटेंगे जातीय चिह्न, स्कूलों में पढ़ाया जाएगा जातिवाद विरोधी पाठ: इलाहाबाद हाई कोर्ट

Written by:Saurabh Singh
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कोर्ट ने डीजीपी के हलफनामे में दिए गए तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि फिंगरप्रिंट, आधार, मोबाइल नंबर और माता-पिता के विवरण जैसे आधुनिक साधनों के रहते जाति आधारित पहचान की कोई जरूरत नहीं है।
वाहनों और सोशल मीडिया से हटेंगे जातीय चिह्न, स्कूलों में पढ़ाया जाएगा जातिवाद विरोधी पाठ: इलाहाबाद हाई कोर्ट

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जातिवाद को बढ़ावा देने वाले प्रतीकों पर कड़ा रुख अपनाते हुए केंद्र सरकार को वाहनों और सोशल मीडिया पर जातीय महिमामंडन के चिह्नों पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने सरकार को स्कूलों में जातिवाद के खिलाफ पाठ्यक्रम शामिल करने और जागरूकता अभियान चलाने का भी आदेश दिया। यह फैसला न्यायमूर्ति विनोद दिवाकर की अदालत ने इटावा के प्रवीण छेत्री के एक मामले की सुनवाई के दौरान दिया, जिसमें पुलिस दस्तावेजों में जाति आधारित प्रविष्टियों पर सवाल उठाए गए थे। कोर्ट ने पुलिस के इस तर्क को खारिज कर दिया कि जाति से पहचान में मदद मिलती है, और इसे आधुनिक तकनीक के युग में अप्रासंगिक बताया।

प्रवीण छेत्री के मामले में, 29 अप्रैल 2023 को इटावा में दो कारों से 300 बोतल अवैध शराब बरामद हुई थी, जिन पर फर्जी नंबर प्लेट थीं। पुलिस ने छेत्री को शराब तस्करी गिरोह का सरगना बताया, जबकि उन्होंने दावा किया कि वह एक पारिवारिक समारोह में शामिल होने जा रहे थे और शराब से उनका कोई संबंध नहीं था। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज कर दी, लेकिन पुलिस दस्तावेजों में जाति के उल्लेख पर कड़ी आपत्ति जताई। कोर्ट ने मार्च में डीजीपी से हलफनामा मांगा था, जिसमें पूछा गया था कि किस कानून के तहत पुलिस आरोपी की जाति दर्ज करती है।

थानों में जातीय महिमामंडन वाले साइन बोर्ड हटाने के आदेश

कोर्ट ने डीजीपी के हलफनामे में दिए गए तर्क को अस्वीकार करते हुए कहा कि फिंगरप्रिंट, आधार, मोबाइल नंबर और माता-पिता के विवरण जैसे आधुनिक साधनों के रहते जाति आधारित पहचान की कोई जरूरत नहीं है। कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को निर्देश दिया कि पुलिस फॉर्म से अनुसूचित जाति/जनजाति से संबंधित मामलों को छोड़कर अन्य सभी मामलों में जाति और धर्म की प्रविष्टियां तत्काल हटाई जाएं। साथ ही, थानों में जातीय महिमामंडन वाले साइन बोर्ड भी हटाने के आदेश दिए गए।

पाठ्यक्रम के माध्यम से नई पीढ़ी को शिक्षित करने पर जोर

यह फैसला सामाजिक समानता को बढ़ावा देने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जातिवाद को बढ़ावा देने वाले प्रतीकों और प्रथाओं को समाप्त करना समय की मांग है। इसके लिए स्कूलों में जागरूकता अभियान और पाठ्यक्रम के माध्यम से नई पीढ़ी को शिक्षित करने पर जोर दिया गया है। इस आदेश से समाज में जातिगत भेदभाव को कम करने और समावेशी संस्कृति को बढ़ावा देने की उम्मीद जताई जा रही है।

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Saurabh Singh
लेखक के बारे में
राजनीति में गहरी रुचि. खबरों के विश्लेषण में तेज और राजनीतिक परिस्थितियों की समझ रखते हैं. देश-दुनिया की घटनाओं पर बारीक नजर और फिर उसे खबरों के रूप में लिखने के शौकीन हैं. View all posts by Saurabh Singh
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