धराली आपदा ने खोली आंखें: नदियों की पूरभूमि पर बसे गांवों और होटलों पर मंडरा रहा खतरा

धराली आपदा ने खोली आंखें: नदियों की पूरभूमि पर बसे गांवों और होटलों पर मंडरा रहा खतरा

उत्तराखंड के धराली गांव में 5 अगस्त को आई भीषण आपदा ने न सिर्फ कई लोगों की जान ली बल्कि क्षेत्र की भौगोलिक और पर्यावरणीय अनदेखी की सच्चाई भी उजागर कर दी। वाडिया हिमालय भूविज्ञान संस्थान के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. सुशील कुमार का कहना है कि अब समय आ गया है जब नदियों के किनारे की पूरभूमियों पर बसी बस्तियों का गहराई से अध्ययन किया जाए।

डॉ. कुमार के अनुसार, धराली में बहने वाली खीरगाड़ बरसाती नदी अपनी पुरानी धारा में ही बह रही थी, लेकिन रास्ते में बने होटल, होमस्टे और मकानों को तबाह कर गई। ये इमारतें न सिर्फ नदी की प्राकृतिक धारा में रुकावट थीं, बल्कि पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ाकर बनाई गईं थीं।

क्या होती है पूरभूमि और क्यों है ये खतरनाक?

पूरभूमि (Floodplain) वह समतल क्षेत्र होता है जो नदी के किनारे होता है और समय-समय पर बाढ़ आने पर जलमग्न हो जाता है। ये क्षेत्र नदी द्वारा जमा की गई मिट्टी और गाद से उपजाऊ तो होते हैं, लेकिन निवास और निर्माण के लिए खतरनाक माने जाते हैं।

ऐसे क्षेत्रों में बसने का चलन आम हो गया है, क्योंकि जमीन सस्ती मिल जाती है और कृषि कार्य भी आसान होता है। मगर बाढ़ या बादल फटने जैसी घटनाओं में यही इलाके सबसे पहले चपेट में आते हैं।

अतिक्रमण और निर्माण में नियमों की अनदेखी

धराली में जो भी नुकसान हुआ, उसमें अनियंत्रित पर्यटन और अवैध निर्माण बड़ी वजह रहे। पिछले कुछ वर्षों में धराली और आसपास होटलों, होमस्टे और रेस्तरां की बाढ़ सी आ गई है, जो नदी के किनारे और पूरभूमि में बिना किसी ठोस नियम के बनाए गए हैं।

टिहरी के भाजपा विधायक किशोर उपाध्याय ने भी स्वीकार किया कि जैसे ही आप ऋषिकेश से पहाड़ों की ओर बढ़ते हैं, नदियों के किनारे अनगिनत होटल और रिजॉर्ट दिखते हैं, जो पर्यावरण के लिए ticking time bomb बन चुके हैं। देहरादून का मालदेवता इलाका, जहां 2023 में सोंग नदी में आई बाढ़ से एक प्रशिक्षण अकादमी ढह गई थी, इसका ताजा उदाहरण है। पर्यावरणीय मानकों की अनदेखी ने तबाही की जमीन तैयार की थी।

प्रशासन की आंख मूंद नीति और राजनीति की भूमिका

पर्यावरणविद अनूप नौटियाल ने देहरादून में रिस्पना नदी के किनारे बनाए गए उत्तराखंड विधानसभा भवन को नियमों के उल्लंघन का सबसे बड़ा उदाहरण बताया है। रिस्पना और बिंदाल नदियों के किनारे बसी दर्जनों कॉलोनियां भी इसी अतिक्रमण का नतीजा हैं।

जानकारों का मानना है कि इसमें भूमाफिया और सरकारी अधिकारियों की मिलीभगत होती है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट दोनों ने ही अतिक्रमण हटाने के निर्देश दिए हैं, लेकिन राजनीतिक दबाव और भ्रष्टाचार के कारण कार्रवाई अधूरी रह जाती है। पूर्व विधायक राजकुमार का कहना है कि वे अतिक्रमण हटाने के खिलाफ नहीं हैं, बशर्ते लोगों को पहले पुनर्वास की गारंटी दी जाए।

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