देहरादून: उत्तराखंड में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने हाल ही में हुए कैबिनेट विस्तार के बाद मंत्रियों के बीच विभागों का बहुप्रतीक्षित बंटवारा कर दिया है। लंबे समय से चल रही अटकलों पर विराम लगाते हुए जारी की गई सूची में मुख्यमंत्री ने शासन की कमान अपने हाथों में मजबूती से बनाए रखी है। उन्होंने गृह, वित्त, कार्मिक, सतर्कता और सूचना जैसे कई अहम विभाग अपने पास ही रखे हैं।
यह विभागीय बंटवारा पांच नए मंत्रियों-खजान दास, मदन कौशिक, भरत सिंह चौधरी, प्रदीप बत्रा और राम सिंह कैड़ा-के शपथ ग्रहण के बाद हुआ है। इस फेरबदल का उद्देश्य प्रशासनिक कार्यों में तेजी लाना और विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना बताया जा रहा है। पहले मुख्यमंत्री के पास 35 से अधिक विभागों का कार्यभार था, जिसे अब मंत्रियों में वितरित कर काम को सुगम बनाने की कोशिश की गई है।
सीएम धामी के पास शासन की रीढ़
प्रशासनिक और राजनीतिक नियंत्रण के लिहाज से मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने कई संवेदनशील और शक्तिशाली मंत्रालय अपने पास रखे हैं। उनके विभागों की सूची में शामिल हैं:
मंत्रिपरिषद, कार्मिक एवं सतर्कता, सचिवालय प्रशासन, नियोजन, राज्य सम्पत्ति, सूचना, गृह, राजस्व, औद्योगिक विकास (खनन सहित), श्रम, पेयजल, ऊर्जा, आबकारी, न्याय, नागरिक उड्डयन, वित्त एवं आवास। इन विभागों को सरकार के संचालन की रीढ़ माना जाता है, जो सीधे तौर पर नीति-निर्माण और कानून-व्यवस्था को प्रभावित करते हैं।
नए मंत्रियों को मिलीं ये अहम जिम्मेदारियां
मंत्रिमंडल में शामिल किए गए पांच नए चेहरों को विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों का जिम्मा सौंपा गया है, ताकि विभागीय कामकाज को गति मिल सके।
खजान दास: समाज कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण, छात्र कल्याण, और भाषा विभाग।
भरत सिंह चौधरी: ग्राम विकास, लघु एवं सूक्ष्म मध्यम उद्यम (MSME), और खादी एवं ग्रामोद्योग।
मदन कौशिक: पंचायतीराज, आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास, आयुष एवं आयुष शिक्षा, पुनर्गठन, और जनगणना।
प्रदीप बत्रा: परिवहन, सूचना प्रौद्योगिकी एवं सुशासन, विज्ञान प्रौद्योगिकी, और जैव प्रौद्योगिकी।
राम सिंह कैड़ा: शहरी विकास, पर्यावरण संरक्षण एवं जलवायु परिवर्तन, और जलागम प्रबंधन।
क्यों जरूरी था यह फेरबदल?
उत्तराखंड मंत्रिमंडल में पांच मंत्रियों के पद काफी लंबे समय से खाली चल रहे थे। इनमें से तीन पद पहले से ही रिक्त थे, जबकि एक पद पूर्व मंत्री चंदन राम दास के निधन और एक अन्य पद प्रेम चंद अग्रवाल के इस्तीफे के कारण खाली हुआ था। इन रिक्तियों के चलते संबंधित विभागों का अतिरिक्त कार्यभार भी मुख्यमंत्री पर ही था, जिससे प्रशासनिक कार्यों पर असर पड़ रहा था। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह बंटवारा क्षेत्रीय और सामाजिक समीकरण साधने के साथ-साथ सरकार की कार्यशैली को अधिक जवाबदेह और परिणामोन्मुखी बनाने की एक रणनीतिक कवायद है।









