हम अक्सर सोचते हैं कि झूठ बोलना सिर्फ दिमाग का खेल है, लेकिन हकीकत यह है कि झूठ बोलते समय हमारा शरीर कई ऐसे संकेत देता है, जिन्हें छुपाना आसान नहीं होता। दिल की धड़कन तेज हो जाती है, सांसें बदलने लगती हैं और पसीना तक आने लगता है। इन्हीं शारीरिक बदलावों को पकड़ने के लिए बनाई गई थी लाई डिटेक्टर तकनीक।
इतिहास में 18 जनवरी 1951 का दिन इसलिए खास माना जाता है क्योंकि इसी दिन नीदरलैंड्स में पहली बार आधिकारिक तौर पर लाई डिटेक्टर टेस्ट का प्रयोग किया गया। इसके बाद यह तकनीक दुनिया भर में चर्चा में आ गई और जांच एजेंसियों की दिलचस्पी बढ़ती चली गई।
लाई डिटेक्टर टेस्ट क्या होता है?
लाई डिटेक्टर टेस्ट को वैज्ञानिक भाषा में पॉलीग्राफ टेस्ट (Polygraph Test) कहा जाता है। आम शब्दों में कहें तो यह एक ऐसी मशीन है जो किसी व्यक्ति के शरीर में हो रहे बदलावों को रिकॉर्ड करती है, जब उससे सवाल पूछे जाते हैं। लाई डिटेक्टर सीधे यह नहीं बताता कि सामने वाला झूठ बोल रहा है या सच। यह मशीन सिर्फ शरीर के संकेतों को मापती है। उन संकेतों को देखकर विशेषज्ञ अंदाजा लगाते हैं कि व्यक्ति तनाव में है या नहीं।
जब पहली बार हुआ बड़ा प्रयोग
18 जनवरी 1951 को नीदरलैंड्स में एक आपराधिक जांच के दौरान पहली बार लाई डिटेक्टर टेस्ट का इस्तेमाल किया गया। उस समय यह तकनीक नई थी और लोगों के लिए काफी रहस्यमयी भी। उस दौर में वैज्ञानिक तरीके से सच जानने के साधन बहुत सीमित थे। ऐसे में लाई डिटेक्टर ने जांच की दुनिया में एक नई उम्मीद जगाई। धीरे-धीरे अमेरिका और यूरोप के कई देशों में पुलिस और जांच एजेंसियों ने इस तकनीक को अपनाना शुरू किया।
लाई डिटेक्टर का आविष्कार किसने किया था?
भले ही पहला बड़ा इस्तेमाल 1951 में हुआ, लेकिन लाई डिटेक्टर का आविष्कार इससे लगभग 30 साल पहले हो चुका था। साल 1921 में जॉन ऑगस्टस लार्सन ने इस मशीन को विकसित किया था। जॉन ऑगस्टस लार्सन एक खास व्यक्ति थे। वह सिर्फ वैज्ञानिक नहीं, बल्कि एक पुलिस अधिकारी भी थे। इसलिए उन्हें जांच के दौरान आने वाली दिक्कतों की अच्छी समझ थी। उन्होंने सोचा कि अगर शरीर के अंदर होने वाले बदलावों को रिकॉर्ड किया जाए, तो सच और झूठ के बीच फर्क समझा जा सकता है।
पॉलीग्राफ मशीन कैसे काम करती है?
लाई डिटेक्टर मशीन देखने में भले ही जटिल लगे, लेकिन इसका सिद्धांत काफी आसान है। जब किसी व्यक्ति से सवाल पूछे जाते हैं, तो मशीन चार मुख्य चीजों को रिकॉर्ड करती है दिल की धड़कन, ब्लड प्रेशर, सांस लेने की गति, त्वचा की नमी, जब इंसान तनाव में होता है, तो उसका शरीर खुद-ब-खुद प्रतिक्रिया देता है। झूठ बोलते समय दिमाग पर दबाव बढ़ता है और यही दबाव शरीर में इन बदलावों की वजह बनता है।
झूठ बोलते समय शरीर क्यों बदलता है?
झूठ बोलना आसान लग सकता है, लेकिन दिमाग इसे एक खतरे की तरह लेता है। दिमाग सोचता है कि अगर झूठ पकड़ा गया तो क्या होगा। इसी डर की वजह से शरीर का नर्वस सिस्टम सक्रिय हो जाता है। इसका असर सीधे दिल, सांस और पसीने पर पड़ता है। लाई डिटेक्टर मशीन इन्हीं बदलावों को पकड़ लेती है। इसलिए कहा जाता है कि झूठ बोलते समय इंसान खुद अपने शरीर से धोखा खा जाता है।
लाई डिटेक्टर टेस्ट के दौरान क्या होता है?
जब किसी व्यक्ति का लाई डिटेक्टर टेस्ट किया जाता है, तो उसे एक कुर्सी पर बैठाया जाता है। उसके शरीर पर मशीन के सेंसर लगाए जाते हैं। ये सेंसर दिल की धड़कन, सांस और पसीने को मापते हैं। सबसे पहले उससे आसान और सामान्य सवाल पूछे जाते हैं, जैसे नाम, उम्र या सामान्य जानकारी। इससे मशीन व्यक्ति की सामान्य स्थिति को समझती है। इसके बाद धीरे-धीरे जांच से जुड़े सवाल पूछे जाते हैं। अगर किसी सवाल पर ग्राफ अचानक बदल जाता है, तो विशेषज्ञ उस प्रतिक्रिया को ध्यान से देखते हैं।





