खाद दुकानदार हुए बेलगाम, शासन के नियमों की उड़ा रहे धज्जियां, कृषि विभाग बेख़बर

कई खाद दुकानों पर न तो रेट लिस्ट लगी है और न ही उपलब्ध स्टॉक का कोई उल्लेख किया गया है। कहीं रेट लिस्ट दिखाई भी देती है तो वह अधूरी या बिना मूल्य और मात्रा के होती है।
Dabra News

डबरा क्षेत्र में बिना रेट लिस्ट चस्पा किए खाद की दुकानों का संचालन धड़ल्ले से जारी है, जबकि स्थानीय कृषि विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों की भौतिक सत्यापन की कार्रवाई सिर्फ़ कागज़ों तक ही सीमित नजर आ रही है। हालात यह हैं कि खाद व्यापारी मनमानी पर उतारू हैं और अन्नदाता किसान इसका सीधा खामियाजा भुगतने को मजबूर हैं।

शासन के स्पष्ट निर्देश हैं कि प्रत्येक खाद विक्रेता को अपनी दुकान पर रेट लिस्ट अनिवार्य रूप से चस्पा करनी होगी, जिसमें खाद का निर्धारित मूल्य और उपलब्ध स्टॉक की पूरी जानकारी अंकित हो, ताकि किसानों को खाद खरीदने में किसी प्रकार की परेशानी न हो। लेकिन जमीनी हकीकत इसके ठीक विपरीत है। क्षेत्र की कई खाद दुकानों पर न तो रेट लिस्ट लगी है और न ही उपलब्ध स्टॉक का कोई उल्लेख किया गया है। कहीं रेट लिस्ट दिखाई भी देती है तो वह अधूरी या बिना मूल्य और मात्रा के होती है।

रेट लिस्ट गायब, मनमानी वसूली 

इस लापरवाही का पूरा फायदा उठाकर कुछ खाद दुकानदार किसानों से मनमाने दाम वसूल रहे हैं। वहीं दूसरी ओर, क्षेत्र में खाद वितरण व्यवस्था को सुचारू रखने और दुकानों की नियमित मॉनिटरिंग करने की जिम्मेदारी जिन कृषि विभाग के अधिकारियों पर है, उनकी सक्रियता शून्य नजर आ रही है।

अधिकारियों की मॉनिटरिंग पर सवाल 

चौंकाने वाली बात यह है कि जब मीडिया द्वारा इस अव्यवस्था की जानकारी संबंधित अधिकारियों को दी जाती है तो उनका रटा-रटाया जवाब होता है कि “क्षेत्र में निरंतर मॉनिटरिंग की जा रही है और खाद वितरण की व्यवस्था पूरी तरह सुचारू है, इस तरह की कोई शिकायत हमारे संज्ञान में नहीं है।” अधिकारियों के इन बयानों से उनकी कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान खड़े हो रहे हैं।

कुल मिलाकर, यह कहना गलत नहीं होगा कि डबरा क्षेत्र में कृषि विभाग के स्थानीय जिम्मेदार अधिकारियों की जमीनी मॉनिटरिंग लगभग शून्य है और खाद माफिया को खुला संरक्षण मिलता नजर आ रहा है, जिसका सबसे बड़ा नुकसान अन्नदाता किसान को झेलना पड़ रहा है। वही जब इस मामले पर दूरभाष के द्वारा जिम्मेदार अधिकारियों से संपर्क करने की कोशिश की गई तो अधिकारियों ने फोन तक उठाना मुंसिफ नहीं समझा

Atul Saxena
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पत्रकारिता में तीन दशक से अधिक का अनुभव.

पत्रकारिता मेरे लिए एक मिशन है, हालाँकि आज की पत्रकारिता ना ब्रह्माण्ड के पहले पत्रकार देवर्षि नारद वाली है और ना ही गणेश शंकर विद्यार्थी वाली, फिर भी मेरा ऐसा मानना है कि यदि खबर को सिर्फ खबर ही रहने दिया जाये तो ये ही सही अर्थों में पत्रकारिता है और मैं इसी मिशन पर पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से लगा हुआ हूँ.... पत्रकारिता के इस भौतिकवादी युग में मेरे जीवन में कई उतार चढ़ाव आये, बहुत सी चुनौतियों का सामना करना पड़ा लेकिन इसके बाद भी ना मैं डरा और ना ही अपने रास्ते से हटा ....पत्रकारिता मेरे जीवन का वो हिस्सा है जिसमें सच्ची और सही ख़बरें मेरी पहचान हैं .... View all posts by Atul Saxena →
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