कोरोना के साथ भूख-प्यास और सोशल इग्नोरेंस के शिकार गरीब, एमपी-यूपी बार्डर सील, सैंकड़ों मज़दूर फंसे

कोरोना के साथ भूख-प्यास और सोशल इग्नोरेंस के शिकार गरीब, एमपी-यूपी बार्डर सील, सैंकड़ों मज़दूर फंसे

दतिया।

जो वीडियो आप इस खबर के साथ देख रहे हैं, ये वीडियो सिर्फ लॉकडाउन का ही नहीं, प्रशासनिक निर्देशों का ही नहीं बल्कि ये वीडियों इंसानियत की सरहदों का भी सरासर उल्लंघन है। कोरोना वायरस के खतरे के बीच मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश की सीमा पर मज़दूरों से भरी गाड़ियां पहुंची थी। इनमें दिल्ली, हरियाणा, नोएडा, आगरा आदि इलाकों से मज़दूर अपने गांव अपने घर पहुंचने आए थे। लेकिन एमपी और यूपी पुलिस ने बॉर्डर सील कर दिया और यूपी पुलिस ने तो बेरहमी से इन्हें डंडे से जानवरों की तरह खदेड़ दिया।

दतिया और झांसी पुलिस ने अपनी सीमा पर मज़दूरों से भरी गाड़ियां रोक दी, यहां आप बॉर्डर पर पहुंचे मजदूरों की लाचारी साफ देख सकते हैं। सैंकड़ों किलोमीटर दूर से आए ये गरीब मजदूर अपने घर पहुंचना चाहते हैं लेकिन इनके लिये स्वास्थ्य विभाग द्वारा कोरोना की जांच का या अन्य किसी तरह का कोई इंतज़ाम नहीं है। उल्टे पुलिस इनके साथ अमानवीय व्यवहार कर रही है। अब हजारों लोग बॉर्डर पर भूखे प्यासे फंसे हुए हैं और इनमें से कई लोगों की तबियत भी बिगड़ रही है। लेकिन न तो मध्यप्रदेश न ही उत्तर प्रदेश का स्वास्थ्य विभाग इनकी सुध ले रहा है। अगर जल्द ही इनके लिये शासन प्रशासन ने कोई व्यवस्था नहीं की तो कोरोना की महामारी का ख़तरा तो है ही लेकिन उससे भी बड़ा खतरा भूख और गरीबी है। ऐसा न हो कि कोरोना से भय से अपने घर की ओर निकले ये ग़रीब मज़दूर बीच राह में भूख से हार जाएं।

Gaurav Sharma
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निदेशक और संपादक

पत्रकारिता पेशा नहीं ज़िम्मेदारी है और जब बात ज़िम्मेदारी की होती है तब ईमानदारी और जवाबदारी से दूरी बनाना असंभव हो जाता है। एक पत्रकार की जवाबदारी समाज के लिए उतनी ही आवश्यक होती है जितनी परिवार के लिए क्यूंकि समाज का हर वर्ग हर शख्स पत्रकार पर आंख बंद कर उस तरह ही भरोसा करता है जितना एक परिवार का सदस्य करता है। पत्रकारिता मनुष्य को समाज के हर परिवेश हर घटनाक्रम से अवगत कराती है, यह इतनी व्यापक है कि जीवन का कोई भी पक्ष इससे अछूता नहीं है। यह समाज की विकृतियों का पर्दाफाश कर उन्हे नष्ट करने में हर वर्ग की मदद करती है। इसलिए पं. कमलापति त्रिपाठी ने लिखा है कि," ज्ञान और विज्ञान, दर्शन और साहित्य, कला और कारीगरी, राजनीति और अर्थनीति, समाजशास्त्र और इतिहास, संघर्ष तथा क्रांति, उत्थान और पतन, निर्माण और विनाश, प्रगति और दुर्गति के छोटे-बड़े प्रवाहों को प्रतिबिंबित करने में पत्रकारिता के समान दूसरा कौन सफल हो सकता है। View all posts by Gaurav Sharma →
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