आकाशवाणी से डिजिटल FM तक, क्यों आज भी करोड़ों लोगों की पहली पसंद है रेडियो

विश्व रेडियो दिवस हमें उस दौर की याद दिलाता है जब रेडियो ही मनोरंजन, खबर और संगीत का सबसे भरोसेमंद साथी था। FM रेडियो के आने के बाद भी रेडियो की लोकप्रियता आज तक बरकरार है।
World Radio Day

एक समय था जब शाम होते ही घरों में रेडियो की आवाज गूंजने लगती थी। लोग अपने काम जल्दी निपटाकर रेडियो के सामने बैठ जाते थे, ताकि पसंदीदा गीत और कार्यक्रम छूट न जाएं। उस दौर में रेडियो सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि परिवार को जोड़ने वाला माध्यम भी था।

समय बदला, टीवी आया, फिर मोबाइल और इंटरनेट का दौर शुरू हुआ, लेकिन रेडियो की अपनी पहचान कभी खत्म नहीं हुई। आज भी लोग सफर के दौरान, काम करते समय या खाली वक्त में FM रेडियो सुनना पसंद करते हैं। विश्व रेडियो दिवस हमें इसी सफर की कहानी याद दिलाता है।

रेडियो का आविष्कार कैसे हुआ

रेडियो के आविष्कार का श्रेय इटली के वैज्ञानिक गुग्लिएल्मो मार्कोनी को दिया जाता है। उन्होंने 1895 में वायरलेस सिग्नल भेजने का सफल प्रयोग किया, जिसने संचार की दुनिया में नई क्रांति ला दी।

1896 में उन्हें इस तकनीक का पेटेंट मिला और बाद में उनके इस योगदान के लिए उन्हें सम्मान भी मिला। रेडियो ने बिना तार के संदेश भेजना संभव बनाया और यही तकनीक आगे चलकर संचार का आधार बनी। रेडियो के आविष्कार ने पूरी दुनिया को जोड़ने का रास्ता खोला और आने वाले दशकों में यह हर देश के जनजीवन का हिस्सा बन गया।

विश्व रेडियो दिवस क्यों मनाया जाता है?

हर साल 13 फरवरी को विश्व रेडियो दिवस मनाया जाता है। यह दिन रेडियो के महत्व और समाज में उसकी भूमिका को याद करने के लिए समर्पित है। इस दिवस को अंतरराष्ट्रीय मान्यता संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दी गई, ताकि रेडियो के माध्यम से सूचना और शिक्षा को बढ़ावा दिया जा सके।

इस दिन का उद्देश्य यह भी है कि दूर-दराज़ क्षेत्रों तक सूचना पहुंचाने में रेडियो आज भी सबसे सस्ता और प्रभावी माध्यम है। प्राकृतिक आपदा हो या आपात स्थिति, रेडियो आज भी भरोसेमंद सूचना का स्रोत बना हुआ है।

भारत में रेडियो की शुरुआत और बढ़ती लोकप्रियता

रेडियो का प्रसारण भारत में 1927 में शुरू हुआ, जब पहला स्टेशन मुंबई में स्थापित हुआ। कुछ वर्षों बाद इसका संचालन सरकार के अधीन आ गया और 1936 में इसका नाम बदलकर ऑल इंडिया रेडियो रखा गया, जिसे आगे चलकर लोग आकाशवाणी के नाम से पहचानने लगे।

आकाशवाणी के जरिए देशभर में समाचार, संगीत, नाटक और ज्ञानवर्धक कार्यक्रम प्रसारित होने लगे। इससे रेडियो घर-घर पहुंच गया और आम लोगों के जीवन का हिस्सा बन गया। मध्य प्रदेश के इंदौर में 1952 में रेडियो स्टेशन स्थापित हुआ, जिसने मालवा क्षेत्र में रेडियो सुनने की परंपरा को और मजबूत किया।

विविध भारती और रेडियो कार्यक्रमों का सुनहरा दौर

1970 और 80 के दशक में विविध भारती ने रेडियो को नई पहचान दी। फिल्मों के गीत, नाटक और मनोरंजन कार्यक्रमों ने लाखों श्रोताओं को रेडियो से जोड़े रखा।

इसी दौर में श्रीलंका से प्रसारित होने वाला कार्यक्रम बिनाका गीतमाला बेहद लोकप्रिय हुआ। इसे अपनी खास आवाज और अंदाज से प्रस्तुत करने वाले अमीन सयानी ने लोगों के दिलों में खास जगह बना ली। लोग बेसब्री से इंतजार करते थे कि कौन सा गीत इस सप्ताह किस पायदान पर पहुंचा। उस समय रेडियो मनोरंजन का सबसे बड़ा साधन था।

FM रेडियो ने कैसे बदली रेडियो की दुनिया?

समय के साथ तकनीक बदली और FM रेडियो का दौर शुरू हुआ। बेहतर आवाज गुणवत्ता, युवा अंदाज और नए कार्यक्रमों ने रेडियो को नई पीढ़ी तक पहुंचा दिया।

साल 2001 में भारत में निजी FM चैनलों की शुरुआत हुई और रेडियो मिर्ची जैसे चैनलों ने रेडियो को आधुनिक अंदाज दिया। RJ की मजेदार बातचीत, लाइव शो और नए गानों ने युवाओं को रेडियो से जोड़े रखा। अब रेडियो सिर्फ गीतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ट्रैफिक अपडेट, लोकल खबरें और इंटरएक्टिव कार्यक्रमों का भी बड़ा माध्यम बन गया।

डिजिटल दौर में भी रेडियो क्यों है जरूरी?

मोबाइल ऐप और इंटरनेट के इस दौर में भी रेडियो की जरूरत खत्म नहीं हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी रेडियो सूचना का सबसे आसान माध्यम है। आपदा या नेटवर्क बंद होने की स्थिति में रेडियो ही काम आता है।

आज कई रेडियो स्टेशन ऑनलाइन भी उपलब्ध हैं, जिससे लोग मोबाइल या इंटरनेट के जरिए भी अपने पसंदीदा कार्यक्रम सुन सकते हैं। यानी रेडियो ने खुद को समय के साथ बदल लिया है।

Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
पत्रकारिता मेरे लिए सिर्फ एक पेशा नहीं, बल्कि सच को जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ समाज तक पहुंचाने का माध्यम है। तथ्यों की पड़ताल, महत्वपूर्ण मुद्दों को समझना और निष्पक्ष खबरों के जरिए लोगों की आवाज़ बनना मेरी पत्रकारिता की पहचान है। View all posts by Bhawna Choubey →
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