हरियाणा के रोहतक स्थित महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय (एमडीयू) की फैकल्टी भर्ती प्रक्रिया एक बार फिर विवादों में घिर गई है। विश्वविद्यालय में संकाय पदों पर चयन के लिए जारी प्रक्रिया पर अनियमितताओं, पैसों के लेन-देन और सिफारिशों के आरोप लगने के बाद हरियाणा सरकार ने तत्काल प्रभाव से प्रक्रिया पर रोक लगा दी है। मुख्यमंत्री के विशेष कार्याधिकारी (OSD) जवाहर नेहरू के निर्देश पर विश्वविद्यालय प्रशासन को एक पंक्ति का आदेश भेजा गया, जिसमें भर्ती को तुरंत रोकने को कहा गया। विश्वविद्यालय ने भी बिना देर किए इस आदेश का पालन करते हुए प्रक्रिया रोक दी।
छात्रों का आरोप, रिश्वत और सिफारिश का खेल
छात्रों का कहना है कि इस भर्ती प्रक्रिया में योग्यता की अनदेखी की जा रही थी। उनका आरोप है कि पैसा और पहचान ही चयन का आधार बन गए थे। इससे कई काबिल उम्मीदवार वंचित रह जाते। विश्वविद्यालय में अध्ययनरत छात्रों और छात्र संगठनों ने भर्ती को पारदर्शी और निष्पक्ष तरीके से दोबारा शुरू करने की मांग की है, ताकि उनकी पढ़ाई बाधित न हो।
408 स्वीकृत पदों में से आधे से ज्यादा खाली
एमडीयू को हाल ही में NAAC से ‘A+’ ग्रेड मिला है, लेकिन ग्रेडिंग रिपोर्ट के मुताबिक, फैकल्टी की भारी कमी इसकी प्रतिष्ठा पर असर डाल सकती है। कुल 408 स्वीकृत पद हैं, जिनमें 221 पद लंबे समय से खाली पड़े हैं। 2013 के बाद से नियमित भर्ती नहीं हुई। यदि समय रहते यह पद नहीं भरे गए, तो NAAC ग्रेडिंग में गिरावट की आशंका है। विश्वविद्यालय के कई विभागों में स्थिति गंभीर है। इतिहास, म्यूजिक और समाजशास्त्र विभागों में सभी पद खाली हैं। केमिस्ट्री विभाग में 23 में से 17 पद खाली। डिफेंस स्टडीज में 4 में से 3 पद, लॉ विभाग में 13 पद रिक्त हैं। इससे विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गुणवत्ता और शिक्षण कार्य दोनों प्रभावित हो रहे हैं।
पुरानी फाइलें खोलती हैं अनियमितताओं का इतिहास
यह पहला मौका नहीं है जब एमडीयू की भर्ती प्रक्रिया विवादों में रही हो, 2016 में बी.के. पूनिया के कार्यकाल में 20 पदों के लिए विज्ञापन निकाला गया था, लेकिन मामला हाईकोर्ट में स्टे के कारण अटक गया। नवंबर 2024 में सरकार ने फिर से भर्ती की अनुमति दी और जनवरी 2025 में 153 पदों के लिए विज्ञापन जारी हुआ। अब दोबारा सरकार के हस्तक्षेप से यह प्रक्रिया थम गई है। वर्तमान कुलपति का कहना है कि यह पूरा कदम सरकारी अनुमति और नियमों के अनुसार उठाया गया था, लेकिन अब सरकार के आदेश के अनुसार, इसे रोका गया है।
छात्रों की मांग, निष्पक्ष जांच और त्वरित समाधान
छात्र संगठनों ने सरकार के निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि समय रहते हस्तक्षेप सही कदम था। लेकिन वे चाहते हैं कि भर्ती प्रक्रिया को जल्द से जल्द दोबारा शुरू किया जाए। भ्रष्टाचार और पक्षपात से पूरी तरह मुक्त तरीके से चयन किया जाए। विश्वविद्यालय के खाली पदों को योग्य और पात्र उम्मीदवारों से भरा जाए। छात्रों का यह भी कहना है कि जब विश्वविद्यालय में ‘A+’ ग्रेड जैसी प्रतिष्ठा है, तो उसे उच्च गुणवत्ता वाली फैकल्टी भी मिलनी चाहिए, जो छात्रों के शैक्षणिक विकास में सहायक हो।
विश्वविद्यालय की गरिमा बचाने का समय
एमडीयू की भर्ती प्रक्रिया में बार-बार विवाद उठना इस प्रतिष्ठित संस्थान की छवि को नुकसान पहुंचाता है। शिक्षा जगत में विश्वास और पारदर्शिता सबसे अहम मूल्य हैं। सरकार का यह कदम इस दिशा में एक सकारात्मक पहल हो सकता है अगर जांच निष्पक्ष और समाधान त्वरित हो। अब जरूरत है कि सरकार और विश्वविद्यालय मिलकर एक ऐसा सिस्टम तैयार करें जिसमें भर्ती योग्यता, अनुभव और निष्पक्षता के आधार पर हो। तभी एमडीयू न केवल ‘A+’ ग्रेड को बनाए रख सकेगा, बल्कि छात्रों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा भी उपलब्ध करा सकेगा।





