धूमल से लेकर जयराम तक, तीन मुख्यमंत्रियों ने बनाई कब्जे नियमित करने की नीति, कोर्ट ने सभी को किया खारिज

2017 में वीरभद्र सिंह सरकार ने दूसरी बार नई नीति लागू की, जिसमें पांच बीघा तक के बगीचों को नियमित करने का प्रस्ताव था।
धूमल से लेकर जयराम तक, तीन मुख्यमंत्रियों ने बनाई कब्जे नियमित करने की नीति, कोर्ट ने सभी को किया खारिज

हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने मंगलवार को राज्य सरकार की अवैध कब्जों को नियमित करने की नीति को निरस्त कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया है कि फरवरी 2026 तक सभी अवैध अतिक्रमण हटाए जाएं। इस फैसले के बाद अब प्रदेश में किसी भी अवैध कब्जे को वैधता नहीं मिल सकेगी। हाई कोर्ट के इस कड़े निर्णय से सरकारी जमीनों पर अवैध निर्माणों के खिलाफ कार्रवाई की उम्मीदें बढ़ गई हैं।

प्रदेश में अवैध कब्जों को नियमित करने की दिशा में सबसे पहली नीति वर्ष 2002 में तत्कालीन मुख्यमंत्री प्रेम कुमार धूमल के कार्यकाल में लाई गई थी। इस नीति के तहत सरकार ने कब्जाधारकों से आवेदन मांगे थे, जिनकी संख्या 1.67 लाख से अधिक रही। हालांकि, इन आवेदनों पर आज तक कोई निर्णायक कार्रवाई नहीं हो सकी, जिससे नीति निष्क्रिय होकर रह गई।

2017 और जयराम सरकार की नीतियां भी रहीं विफल

2017 में वीरभद्र सिंह सरकार ने दूसरी बार नई नीति लागू की, जिसमें पांच बीघा तक के बगीचों को नियमित करने का प्रस्ताव था। यह नीति छोटे बागबानों को राहत देने के लिए थी, लेकिन इसे भी कभी प्रभावी रूप से लागू नहीं किया गया। इसके बाद जयराम ठाकुर सरकार के कार्यकाल में शिमला के कृष्णानगर क्षेत्र में अवैध कब्जों को नियमित करने की नीति लाई गई थी। परंतु आवश्यक दस्तावेज न होने के कारण अधिकतर लोग आवेदन नहीं कर पाए और यह प्रयास भी निष्फल हो गया।

कोई ठोस आंकड़ा नहीं, हाई कोर्ट के आदेश से नीति का अध्याय समाप्त

हाई कोर्ट के हालिया आदेश के बाद अब पूर्व की सभी नियमितीकरण नीतियों का औचित्य समाप्त हो गया है। सरकार के पास यह स्पष्ट जानकारी तक नहीं है कि 2002 के बाद से कितने नए आवेदन कब्जों के नियमितीकरण के लिए प्राप्त हुए। इस तरह, लगभग दो दशकों से चल रहे अवैध कब्जों को वैध करने के सभी प्रयास अब कानूनी रूप से समाप्त हो चुके हैं, और अब प्रदेश में व्यापक अतिक्रमण हटाओ अभियान की संभावना बन गई है।

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