Hindi News

हिमाचल में 30 हजार पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म, अब BDO-CEO संभालेंगे कमान, 30 अप्रैल तक टले चुनाव

Written by:Rishabh Namdev
Published:
हिमाचल प्रदेश की 3500 से ज्यादा पंचायतों में 30 हजार जनप्रतिनिधियों का कार्यकाल समाप्त हो गया है। चुनाव में देरी के चलते सरकार ने पंचायतों, पंचायत समितियों और जिला परिषदों में प्रशासकों की नियुक्ति की है। अब विकास कार्यों से लेकर भुगतान तक के सभी फैसले BDO और CEO स्तर के अधिकारी लेंगे।
हिमाचल में 30 हजार पंचायत प्रतिनिधियों का कार्यकाल खत्म, अब BDO-CEO संभालेंगे कमान, 30 अप्रैल तक टले चुनाव

हिमाचल प्रदेश में पंचायती राज व्यवस्था एक अभूतपूर्व दौर से गुजर रही है। प्रदेश की 3,577 पंचायतों में 30 हजार से अधिक जनप्रतिनिधियों का पांच साल का कार्यकाल समाप्त होने के साथ ही सभी पंचायतें स्वतः भंग हो गई हैं। चुनाव समय पर न होने के कारण सरकार ने इन सभी में प्रशासक (Administrator) नियुक्त कर दिए हैं।

कार्यकाल पूरा होने से प्रधान, उप-प्रधान, वार्ड सदस्य, पंचायत समिति सदस्य (BDC) और जिला परिषद सदस्य पदमुक्त हो गए हैं। यह प्रदेश के इतिहास में पहली बार है जब सभी पंचायतें एक साथ बिना निर्वाचित प्रतिनिधियों के हैं और उनका कामकाज चलाने के लिए प्रशासकों की नियुक्ति करनी पड़ी है। अब पंचायतों में होने वाले सभी विकास कार्य, योजनाओं की स्वीकृति और प्रशासनिक फैसले इन्हीं प्रशासकों के हाथ में होंगे।

क्यों नियुक्त करने पड़े प्रशासक?

दरअसल, प्रदेश की पंचायतों और 73 नगर निकायों में चुनाव दिसंबर-जनवरी में प्रस्तावित थे। राज्य चुनाव आयोग इसके लिए पूरी तरह तैयार था, लेकिन प्रदेश सरकार ने हालिया आपदा का हवाला देते हुए चुनाव कराने में असमर्थता जताई। इसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, जहां एक जनहित याचिका पर सुनवाई हुई।

हाईकोर्ट ने सरकार को 30 अप्रैल से पहले पंचायत चुनाव कराने के आदेश दिए हैं। इस फैसले के कारण अब लगभग तीन महीने तक पंचायतें बिना जनप्रतिनिधियों के रहेंगी, जिसके चलते प्रशासक नियुक्त करने की नौबत आई है। लोकतंत्र में इस स्थिति को आदर्श नहीं माना जाता है।

किसे मिली क्या जिम्मेदारी?

सरकार ने त्रिस्तरीय पंचायती राज व्यवस्था के लिए अलग-अलग अधिकारियों को प्रशासक नियुक्त किया है।

  • ग्राम पंचायत: खंड विकास अधिकारी (BDO) को प्रशासक और पंचायत सचिव को सदस्य सचिव बनाया गया है।
  • पंचायत समिति (BDC): मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को प्रशासक, सामाजिक शिक्षा एवं खंड योजना अधिकारी (SEBPO) को सदस्य और पंचायत निरीक्षक/उप-निरीक्षक को सदस्य सचिव नियुक्त किया गया है।
  • जिला परिषद: यहां भी मुख्य कार्यकारी अधिकारी (CEO) को प्रशासक, जिला विकास अधिकारी को सदस्य और जिला पंचायत अधिकारी (DPO) को सदस्य सचिव का जिम्मा सौंपा गया है।

सरकारी खजाने पर असर: बचत भी, अनुदान पर खतरा भी

इस व्यवस्था का सीधा असर सरकारी खजाने पर पड़ेगा। सरकार पंचायत प्रतिनिधियों के मानदेय पर हर महीने करीब 5 करोड़ रुपये खर्च करती है। चुनाव होने तक यह राशि बचेगी, जो तीन महीनों में लगभग 15 करोड़ रुपये होगी।

हालांकि, इसका एक नकारात्मक पहलू भी है। 15वें वित्त आयोग के दिशानिर्देशों के अनुसार, बजट और अनुदान के लिए पंचायतों का निर्वाचित होना अनिवार्य है। मौजूदा वित्त वर्ष के लिए 171 करोड़ की ग्रांट मिल चुकी है, लेकिन 1 अप्रैल से 16वां वित्त आयोग लागू होने के बाद नए अनुदान पर रोक लग सकती है।

पहले भी लग चुके हैं प्रशासक

यह पहला मौका है जब पूरे प्रदेश की पंचायतों में प्रशासक लगे हैं। इससे पहले 2021 में कोरोना काल के दौरान लाहौल-स्पीति और पांगी जैसे दुर्गम क्षेत्रों की करीब 45 पंचायतों में प्रशासक नियुक्त किए गए थे, लेकिन तब यह व्यवस्था कुछ चुनिंदा क्षेत्रों तक ही सीमित थी। पंचायतों से कुछ दिन पहले ही सरकार 47 नगर निकायों में भी प्रशासक नियुक्त कर चुकी है।

मध्य प्रदेश से जुड़ी विश्वसनीय और ताज़ा खबरें MP Breaking News in Hindi यहां आपको मिलती है MP News के साथ साथ लगातार अपडेट, राजनीति, अपराध, मौसम और स्थानीय घटनाओं की सटीक जानकारी। भरोसेमंद खबरों के लिए हमारे साथ जुड़े रहें और अपडेटेड रहें !