
हिंदू धर्म में सबसे बड़ा त्योहार दिवाली को ही माना गया है। 5 दिवसीय इस त्योहार को लोग बड़ी ही धूमधाम से मनाते हैं। धनतेरस से इस त्योहार की शुरूआत होती है। जो भाईदूज तक चलता है। धनतेरस के एक दिन बाद और दिवाली के एक दिन पहले छोटी दिवाली मनाई जाती है जिसे नरक चतुर्दशी और काली चौदस भी कहते हैं। आज यानि 19 अक्टूबर को छोटी दिवाली मनाई जा रही है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि आखिर छोटी दिवाली मनाई क्योंं जाती है और इसे नरक नरक चतुर्दशी क्यों कहते हैं? चलिए आज हम इसके पीछे की पौराणिक कथा के बारे में बताते हैं।
छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा
छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी की पौराणिक कथा भगवान श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा से जुड़ी हुई है। भगवान श्रीकृष्ण और उनकी पत्नी सत्यभामा ने इस दिन राक्षस राजा नरकासुर का वध किया था। नरकासुर एक क्रूर राक्षस राजा था, जिससे स्वर्ग और पृथ्वी में अपना आतंक मचा के रखा था। नरकासुर भूदेवी और भगवान वराह का पुत्र था लेकिन उसने बुराई के रास्ते पर चलकर पहले तो देवताओं पर आक्रमण किया और फिर उन्हें पराजित कर उनका धन लूट लिया।
नरकासुर का अत्याचार यहां तक खत्म नहीं हुआ कि उसने 16,000 स्त्रियों को कैद कर लिया। उसके पापों से सारा ब्रह्मांड परेशान हो गया। देवता उसकी अत्याचारों से मुक्ति पाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण से मदद की गुहार लगाई। इसके बाद भगवान कृष्ण अपनी पत्नी सत्यभामा (जो भूदेवी का ही रूप थीं) के साथ गरुड़ पर सवार होकर नरकासुर से युद्ध करने गए।
जैसा कि ज्ञात हो कि श्रीकृष्ण भगवान विष्णु के अवतार हैं लेकिन नरकासुर को इसके बारे में जानकारी नहीं थी। नरकासुर और भगवान श्रीकृष्ण के बीच भयंकर युद्ध हुआ, लेकिन अंत में भगवान श्रीकृष्ण ने अपने सुदर्शन चक्र से नरकासुर का वध किया। इसके बाद श्रीकृष्ण ने उन 16,000 महिलाओं को मुक्त कराया, जिन्होंने सुरक्षा और सम्मान के लिए उनसे विवाह करने की इच्छा जताई। इस विजय के बाद ब्रह्मांड में फिर से शांति स्थापित हुई। यह युद्ध कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी के दिन हुआ था इसलिए इस तिथि को ‘नरक चतुर्दशी’ कहा जाने लगा।
छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी पर क्या करें?
छोटी दिवाली या नरक चतुर्दशी दिवाली की पूर्व संध्या है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, नरक चतुर्दशी के दिन प्रातः काल स्नान करने, दीपदान करने और यमराज की पूजा करने से पापों का नाश होता है और अकाल मृत्यु का भय समाप्त होता है। इसके बाद शाम को घरों के द्वार और खासतौर पर पीपल के पेड़ के नीचे दीपक जलाएं। इतना ही नहीं कुछ स्थानों पर लोग इस दिन भूत प्रेत और नकारात्मक शक्तियों से बचाव के लिए भी दीप जलाते हैं।
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