
हर बड़ा आंदोलन किसी न किसी आम इंसान की असाधारण हिम्मत से पहचान बनाता है। दरअसल नीट पेपर लीक विवाद के दौरान मध्य प्रदेश में ऐसा ही एक नाम सामने आया है अरुण बड़ोले। बड़वानी जिले के एक छोटे से गांव से आने वाले अरुण ने इंदौर में 26 दिनों तक छात्रों के आंदोलन का नेतृत्व किया। सीमित संसाधनों के बावजूद उन्होंने लगातार शांतिपूर्ण तरीके से छात्रों की मांगों को उठाया और हजारों युवाओं के बीच अपनी अलग पहचान बनाई।
दरअसल अरुण का संघर्ष केवल आंदोलन तक सीमित नहीं है। उनका निजी जीवन भी कठिनाइयों से भरा रहा है। मां खेतों में मजदूरी करके परिवार चलाती हैं, जबकि पिता की आंखों की रोशनी कमजोर होने के कारण उनकी काम करने की क्षमता पहले जैसी नहीं रही। इन हालातों के बीच अरुण अपनी पढ़ाई जारी रखते हुए खुद भी मेहनत कर खर्च उठाते हैं। यही अनुभव उन्हें दूसरे छात्रों की परेशानियों को समझने और उनके साथ खड़े होने की ताकत देता है।
NEET आंदोलन में अरुण बड़ोले कैसे बने छात्रों की आवाज़?
अरुण बड़ोले पिछले छह वर्षों से इंदौर में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। देवी अहिल्या विश्वविद्यालय में शिक्षा हासिल करने के दौरान उन्होंने देखा कि नीट पेपर लीक को लेकर देशभर के छात्रों में नाराजगी बढ़ रही है। दिल्ली में चल रहे आंदोलन और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग ने उन्हें भी प्रभावित किया। इसके बाद उन्होंने इंदौर में शांतिपूर्ण आंदोलन शुरू करने का फैसला किया।
30 जून को आंदोलन की शुरुआत हुई तो उनके साथ केवल कुछ साथी ही मौजूद थे। शुरुआती दिनों में धरना स्थल पर भीड़ बेहद कम रही। कई बार ऐसा भी हुआ जब आंदोलन स्थल लगभग खाली दिखाई दिया। इसके बावजूद अरुण और उनके साथियों ने प्रदर्शन जारी रखा। धीरे-धीरे अन्य छात्र, सामाजिक संगठन और शहर के कई लोग इस अभियान से जुड़ते गए। कुछ ही दिनों में यह आंदोलन इंदौर में चर्चा का विषय बन गया और लगातार 26 दिनों तक चलता रहा।
वहीं अरुण का कहना है कि उनका उद्देश्य किसी व्यक्ति या संस्था के खिलाफ नहीं, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता और छात्रों के साथ न्याय सुनिश्चित करना था। उनका मानना है कि प्रतियोगी परीक्षाओं में विश्वास बना रहना लाखों युवाओं के भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।
आर्थिक तंगी के बीच पढ़ाई, नौकरी और परिवार की जिम्मेदारी भी निभा रहे हैं अरुण
दरअसल आंदोलन के पीछे अरुण की निजी कहानी भी उतनी ही प्रेरणादायक है। बड़वानी जिले की राजपुर तहसील के लिंबई गांव के रहने वाले अरुण ऐसे परिवार से आते हैं, जहां हर दिन मेहनत करके घर का खर्च चलता है। उनकी मां खेतों में मजदूरी करती हैं, जबकि पिता की आंखों की समस्या के कारण नियमित काम करना मुश्किल हो गया है। परिवार में तीन बहनों की जिम्मेदारी भी है।
अपनी पढ़ाई, किराया और रोजमर्रा के खर्च पूरे करने के लिए अरुण ड्राइविंग का काम भी करते हैं। इसके बावजूद उन्होंने आंदोलन को बीच में नहीं छोड़ा। उनका कहना है कि यदि छात्र अपने अधिकारों के लिए शांतिपूर्ण तरीके से आवाज़ नहीं उठाएंगे, तो शिक्षा व्यवस्था में सुधार की उम्मीद कमजोर पड़ जाएगी।
आंदोलन खत्म होने के बाद भी अरुण शिक्षा से जुड़े मुद्दों पर सक्रिय रहने की बात कहते हैं। उनका मानना है कि यह लड़ाई केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम में पारदर्शिता, निष्पक्षता और छात्रों के भरोसे से जुड़ी हुई है। भविष्य में यदि विद्यार्थियों के हितों से जुड़े किसी मुद्दे पर जरूरत पड़ी, तो वे फिर लोकतांत्रिक और शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने के लिए तैयार रहेंगे।
कंटेंट राइटर

