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इंदौर में 15 साल पुराना अनाज मंडी शिफ्टिंग प्रोजेक्ट फिर अटका, आईडीए ने खींचे हाथ, जानिए क्या है इसके पीछे की वजह?

Written by:Rishabh Namdev
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इंदौर की वर्षों पुरानी छावनी अनाज मंडी को मोरोद में शिफ्ट करने की महत्वाकांक्षी योजना एक बार फिर अटक गई है। इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) ने इस 15 साल पुराने प्रोजेक्ट से खुद को अलग कर लिया है। जमीन के स्वामित्व विवाद और वन भूमि की अड़चन के चलते यह योजना अब लटक गई है।
इंदौर में 15 साल पुराना अनाज मंडी शिफ्टिंग प्रोजेक्ट फिर अटका, आईडीए ने खींचे हाथ, जानिए क्या है इसके पीछे की वजह?

इंदौर में 15 साल पुरानी छावनी अनाज मंडी को मोरोद शिफ्ट करने की महत्वाकांक्षी योजना एक बार फिर अटक गई है। दरअसल इंदौर विकास प्राधिकरण (आईडीए) ने इस प्रोजेक्ट से खुद को अलग कर लिया है। जमीन के स्वामित्व विवाद और वन भूमि की अड़चन के चलते ग्रेन मार्केट और ट्रांसपोर्ट नगर बनाने की योजना फिलहाल अधर में लटक गई है।

यह परियोजना मोरोद में करीब 310 एकड़ जमीन पर विकसित की जानी थी। योजना के अनुसार, शहर के बीच स्थित छावनी अनाज मंडी की कीमती जमीन आईडीए को व्यावसायिक विकास के लिए दी जानी थी। इस जमीन को बेचकर मिलने वाली राशि से मोरोद में नई आधुनिक मंडी बनाने की लागत पूरी की जानी थी। लेकिन जमीन से जुड़े कानूनी विवादों ने पूरे प्रोजेक्ट को उलझा दिया।

दान स्वरूप प्राप्त हुई थी मौजूदा जमीन

मंडी सूत्रों के मुताबिक, छावनी मंडी की मौजूदा जमीन मूल रूप से दान स्वरूप प्राप्त हुई थी। ऐसे में इस जमीन का आईडीए को हस्तांतरण कानूनी रूप से स्पष्ट नहीं हो पा रहा था। दान में मिली जमीन को किसी व्यावसायिक परियोजना के लिए बेचना या हस्तांतरित करना हमेशा कानूनी रूप से जटिल होता है। यही वजह रही कि प्राधिकरण के लिए परियोजना की लागत वसूलना मुश्किल हो गया।

दूसरी ओर मोरोद में प्रस्तावित जमीन का लगभग 77 हेक्टेयर हिस्सा वन भूमि में आता है। इस जमीन के लिए वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं मिल सका। वन विभाग से अनुमति लेना लंबी और जटिल प्रक्रिया होती है, जिसमें पर्यावरण संबंधी कई शर्तें पूरी करनी पड़ती हैं या वैकल्पिक जमीन देनी होती है। प्राधिकरण ने दूसरे जिलों में वैकल्पिक जमीन देने का प्रस्ताव भी रखा था, लेकिन उसे मंजूरी नहीं मिली।

बोर्ड बैठक में इस परियोजना से पीछे हटने का फैसला

इन अड़चनों के कारण आईडीए ने हाल ही में हुई बोर्ड बैठक में इस परियोजना से पीछे हटने का फैसला कर लिया। प्राधिकरण ने इस प्रोजेक्ट पर कंसल्टेंसी के रूप में करीब 9.5 लाख रुपये खर्च किए थे और अब मंडी बोर्ड से यह राशि लौटाने का अनुरोध भी किया है। अब नई मंडी विकसित करने की पूरी जिम्मेदारी मंडी बोर्ड पर आ गई है। आईडीए के सीईओ परिक्षित जाड़े के अनुसार, मंडी सचिव से छावनी मंडी की जमीन की कानूनी स्थिति स्पष्ट करने को कहा गया है। यदि जमीन का हस्तांतरण कानूनी रूप से संभव हुआ तो प्राधिकरण इस परियोजना पर दोबारा विचार कर सकता है।

इस परियोजना में हो रही देरी का सीधा असर किसानों और व्यापारियों पर पड़ रहा है। शहर के बीच स्थित छावनी मंडी के कारण ट्रैफिक जाम की समस्या लगातार बढ़ रही है। नो-एंट्री नियमों के कारण किसानों को रात में अपनी उपज मंडी में लानी पड़ती है, जिससे उन्हें परेशानी होती है। वहीं व्यापारियों को माल बाहर भेजने के लिए देर रात तक इंतजार करना पड़ता है। सीजन के समय मंडी में जगह की कमी से जाम की स्थिति बन जाती है, जिससे उपज की नीलामी और तौल प्रक्रिया भी प्रभावित होती है।

Rishabh Namdev
लेखक के बारे में
मैं ऋषभ नामदेव खेल से लेकर राजनीति तक हर तरह की खबर लिखने में सक्षम हूं। मैं जर्नलिज्म की फील्ड में पिछले 4 साल से काम कर रहा हूं। View all posts by Rishabh Namdev
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