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इंदौर चोरल महू जंगल में बाघ की मूवमेंट, कई जगहों पर मिले पंजों के निशान

Written by:Ankita Chourdia
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इंदौर वनमंडल के चोरल-महू बेल्ट में जनवरी-फरवरी के दौरान बाघ की मौजूदगी के ठोस संकेत मिले हैं, जिनमें पगमार्क और विष्ठा शामिल हैं। वन विभाग ने कई संवेदनशील इलाकों में कैमरा ट्रैप बढ़ाए हैं और डेटा वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, देहरादून को भेजा जा रहा है। अधिकारियों के मुताबिक उदयनगर से बड़वाह तक का वन क्षेत्र अब उभरते टाइगर कॉरिडोर के रूप में देखा जा रहा है।
इंदौर चोरल महू जंगल में बाघ की मूवमेंट, कई जगहों पर मिले पंजों के निशान

इंदौर के आसपास के जंगलों में बड़े मांसाहारी वन्यजीवों की गतिविधि अब छिटपुट सूचना भर नहीं रह गई है। चोरल और महू क्षेत्र में जनवरी-फरवरी के बीच बाघ की मौजूदगी के ठोस प्रमाण दर्ज किए गए हैं। कई जगह पगमार्क मिले, विष्ठा के नमूने मिले, और तेंदुओं की रोजाना आवाजाही भी रिकॉर्ड हुई। वन अधिकारियों का आकलन है कि यह पूरा बेल्ट धीरे-धीरे एक सक्रिय टाइगर मूवमेंट जोन में बदल रहा है।

दिसंबर के तीसरे सप्ताह में हुई ऑल इंडिया टाइगर एस्टीमेशन के दौरान भी इंदौर वनमंडल में बाघ की हलचल महत्वपूर्ण मानी गई। सर्वे के दौरान नाहरझाबुआ-भड़किया, उमठ-वेका (चोरल) और मलेंडी-मांगलिया (महू) जैसे इलाकों में संकेत दर्ज हुए। विभागीय स्तर पर यह भी कहा जा रहा है कि बाघ उदयनगर से बड़वाह तक नया टेरिटरी पैटर्न बना रहे हैं, जो आने वाले समय में मध्य भारत के वन्यजीव मानचित्र पर अहम हो सकता है।

क्यों बढ़ रहा है इंदौर-चोरल-महू बेल्ट का महत्व

विशेषज्ञों के अनुसार इस क्षेत्र में तीन बातें एक साथ दिख रही हैं—घना वन, पानी की उपलब्धता और शिकार प्रजातियों की पर्याप्त मौजूदगी। सांभर, चीतल, हिरण और नीलगाय जैसे शाकाहारी वन्यजीवों की संख्या बढ़ना बड़े शिकारी प्राणियों के लिए प्राकृतिक आकर्षण बनता है। यही कारण है कि जहां पहले तेंदुए की उपस्थिति अधिक चर्चा में रहती थी, अब बाघ की गतिविधि भी लगातार ट्रैक की जा रही है।

खिवनी अभयारण्य से उदयनगर-बड़वाह तक फैला वन क्षेत्र लंबे समय से संभावित संपर्क मार्ग माना जाता रहा है। वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया, देहरादून भी इसे संभावित टाइगर कॉरिडोर की श्रेणी में देखता है। पिछले कुछ वर्षों में सड़क, रेलवे और अन्य विकास परियोजनाओं का दबाव पारंपरिक आवासों पर बढ़ा है, ऐसे में वन्यजीवों का सुरक्षित इलाकों की ओर खिसकना एक स्थापित पारिस्थितिकी पैटर्न माना जाता है। 2022 के बाद से चोरल, महू और मानपुर में बढ़ी गतिविधियां इसी बदलाव के संदर्भ में पढ़ी जा रही हैं।

कैमरा ट्रैप नेटवर्क: कहां-कहां निगरानी

वन विभाग ने मूवमेंट मॉनिटरिंग के लिए चोरल के सेंटल-मेंटल, उमठ, बेका, राजपुरा और कुलथाना में कैमरा ट्रैप लगाए हैं। महू क्षेत्र में आशापुर, बड़िया और मांगलिया, जबकि इंदौर रेंज में नाहरझाबुआ, खुडैल और सिवनी जैसे बिंदुओं पर निगरानी बढ़ाई गई है। इन कैमरों से मिल रही तस्वीरें और लोकेशन डेटा विशेषज्ञों के अध्ययन के लिए देहरादून भेजे जा रहे हैं ताकि संख्या, दिशा और कॉरिडोर उपयोग की पुष्टि अधिक वैज्ञानिक तरीके से हो सके।

मैदानी अधिकारियों का कहना है कि एक-दो विजुअल से निष्कर्ष नहीं निकाले जाते; लगातार कई महीनों के संकेतों को मिलाकर ही मूवमेंट का पैटर्न बनता है। इसलिए पगमार्क, कैमरा रिकॉर्ड, विष्ठा और समय-स्थान डेटा को साथ पढ़ा जा रहा है। इस वजह से चोरल-महू लैंडस्केप पर विभागीय फोकस बढ़ा है।

विकास परियोजनाएं, दबाव और आवास परिवर्तन

इंदौर-खंडवा राजमार्ग, महू-सनावद रेल लाइन और नर्मदा लिंक परियोजना जैसे कार्यों का असर वन क्षेत्र पर पड़ा है। आवास खंडित होने पर वन्यजीव अक्सर वैकल्पिक, अपेक्षाकृत शांत पट्टियों का इस्तेमाल करने लगते हैं। मांचल में फर्नीचर-टाइल क्लस्टर और मौरौद में प्रस्तावित अनाज मंडी जैसे स्थानीय स्तर के दबाव भी इस चर्चा का हिस्सा हैं। संरक्षण विशेषज्ञों का तर्क है कि अगर ऐसे क्षेत्रों में भूमि उपयोग योजना और वन्यजीव मूवमेंट मैपिंग साथ-साथ नहीं चली, तो भविष्य में मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है।

विशेषज्ञ अभय जैन ने नए बन रहे कॉरिडोर की सुरक्षा पर जोर दिया है। उनका कहना है कि बाघों की सुरक्षित आवाजाही सुनिश्चित करने के लिए संरक्षण गाइडलाइंस, विकास कार्यों में संतुलन और जंगल की निरंतर सुरक्षा एक साथ लागू करनी होगी।

“वन विभाग इनकी सुरक्षा को लेकर पूरी तरह गंभीर है। सूचना तंत्र मजबूत किया जाएगा। गर्मियों में आग, अतिक्रमण और अवैध कटाई रोकने के लिए विशेष इंतजाम किए जाएंगे, क्योंकि जंगल में डिस्टर्बेंस का असर वन्यप्राणियों पर सीधा पड़ता है।” — लाल सुधाकर सिंह, DFO, इंदौर वनमंडल

एमपी का बड़ा परिप्रेक्ष्य: बाघ और तेंदुए की बढ़ती संख्या

राज्य स्तर के आंकड़े भी इस क्षेत्रीय ट्रेंड को व्यापक संदर्भ देते हैं। उपलब्ध गणनाओं के मुताबिक मध्य प्रदेश में बाघों की संख्या 2006 में 300, 2010 में 257, 2014 में 308, 2018 में 526 और 2022 में 785 दर्ज हुई। तेंदुओं की संख्या 2010 में 1200, 2014 में 1817, 2018 में 3421 और 2022 में 3907 रही। इंदौर वनमंडल में तेंदुओं की उपस्थिति बाघों की तुलना में तेज दर से बढ़ने की बात भी विभाग ने कही है।

कुल मिलाकर संकेत साफ हैं: इंदौर-चोरल-महू क्षेत्र में वन्यजीव उपस्थिति अब संरक्षण एजेंसियों के लिए प्राथमिक निगरानी क्षेत्र बन चुका है। यह वन्यजीव संरक्षण की प्रगति का संकेत है, लेकिन इसके साथ जमीन पर प्रबंधन, आग और अतिक्रमण नियंत्रण, तथा स्थानीय समुदायों के साथ समन्वय निर्णायक रहेगा। आने वाले सर्वे और कैमरा ट्रैप डेटा इस उभरते कॉरिडोर की स्थिति को और स्पष्ट करेंगे।

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