रेलवे के एक टिकट बुकिंग क्लर्क को आखिरकार 25 साल बाद इंसाफ मिल ही गया, मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने क्लर्क के विरुद्ध की गई रेलवे और विजिलेंस की कार्रवाई को अवैध बताते हुए नियम विरुद्ध बताया, इस दौरान उन्हें पहले निलंबन और फिर बर्खास्तगी तक झेलनी पड़ी।
रेलवे में जॉब करने वाले एक बुकिंग क्लर्क को 2001 में जब से निकाल दिया था जिसको लेकर उन्होंने पहले केंद्रीय प्रशासनिक प्राधिकरण और फिर हाईकोर्ट में अपील दायर की आखिरकार उन्हें 25 साल बाद इंसाफ मिला। उनकी गलती से इतनी थी कि जल्दबाजी में उन्होंने यात्री को 10 रुपये कम दे दिए थे जिसको लेकर विजिलेंस ने उनके खिलाफ कार्यवाही की थी। जस्टिस विवेक रूसिया और जस्टिस प्रदीप मित्तल की कोर्ट ने बुकिंग क्लर्क नारायण नायर को राहत दी है। कोर्ट ने सख्त टिप्पणी करते हुए विजिलेंस विभाग की पूरी कार्रवाई को अवैध और नियमों के खिलाफ ठहरा दिया।
दर असल 4 जनवरी 2001 को रेलवे में पदस्थ बुकिंग क्लर्क नारायण नायर की श्रीधाम स्टेशन पर टिकट काउंटर पर ड्यूटी लगी थी। इसी दौरान विजिलेंस की टीम आ गई। जांच के दौरान एक शख्स सामने आया, जिसका कहना था कि नारायण नायर को 31 रुपए वापस करने थे, पर उन्होंने 21 रुपए लौटाए। विजिलेंस टीम का कहना था कि नारायण नायर के पास 450 रुपए अतिरिक्त भी थे, जिस पर उन्होंने बताया कि यह रुपए पत्नी की दवा लाने के लिए रखे थे। विजिलेंस को मौके पर टिकट का बंडल भी मिला था, जिसको लेकर कहा गया कि वो जमीन पर पड़ा था, जिसको लेकर उन्हें जानकारी नहीं है। इसके अलावा 778 रुपए अतिरिक्त थे, जो कि बाद में सिर्फ 7 रुपए पाए गए।
पहले निलंबित किया फिर सेवा से बर्खास्त कर दिया
जांच के दौरान नारायण नायर को दोषी पाते हुए पहले निलंबित कर दिया गया, उसके बाद 15 मार्च 2002 को सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। नारायण नायर ने विजिलेंस की कार्रवाई के विरोध में वरिष्ठ अधिकारी सहायक मंडल रेलवे प्रबंधक के समक्ष अपील की, कोई आरोप भी सिद्ध नहीं हुआ, इसके बाद भी उन्हें वहां से राहत नहीं मिली, तो वर्ष 2002 में ही केंद्रीय प्रशासनिक प्रधिकरण (CAT) में केस दायर किया।
CAT ने बर्खास्तगी आदेश निरस्त किया, रेलवे पहुंचा हाईकोर्ट
केंद्रीय प्रशासनिक प्रधिकरण (CAT) ने मामले पर सुनवाई करते हुए 16 जुलाई 2004 को नारायण नायर को राहत देते हुए उनकी सेवा से हुई बर्खास्तगी के आदेश को निरस्त कर दिया। केट के आदेश को रेलवे ने हाई कोर्ट में चुनौती देते हुए 2005 में अपील दायर की थी।
25 साल बाद मिला न्याय
हाई कोर्ट में सुनवाई के दौरान टीटी नारायण नायर की ओर से अधिवक्ता आकाश चौधरी ने दलीलें रखी। लगातार कई सालों तक चले इस केस में आखिरकार अप्रैल 2026 को 25 साल बाद फैसला आया और क्लर्क को न्याय मिला। डिवीजन बेंच सुनवाई के बाद दिए फैसले में विजिलेंस की जांच में गंभीर खामियां पाईं।






