
MP High Court
प्रदेश के कटनी जिले के कैमोर में दशकों से जमा एस्बेस्टस युक्त औद्योगिक कचरे और उससे लोगों की सेहत पर पड़ने वाले असर का मामला हाईकोर्ट पहुंच गया है। जबलपुर हाईकोर्ट ने गुरुवार को इस मामले में दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए केंद्र और राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। याचिका में दावा किया गया है कि कैमोर और आसपास के इलाकों में करीब 10 लाख टन मिट्टी एस्बेस्टस से दूषित हो सकती है। इससे हजारों लोगों के स्वास्थ्य पर खतरे की आशंका जताई गई है।
यह जनहित याचिका समाजसेवी आशुतोष दीक्षित मनु और कैमोर निवासी गणेश राव ने दायर की है। याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आर्यन उर्मलिया ने पैरवी की। याचिका में कैमोर में एस्बेस्टस प्रदूषण की वैज्ञानिक जांच कराने, प्रभावित लोगों को इलाज उपलब्ध कराने और दूषित कचरे के सुरक्षित निस्तारण की मांग की गई है।
1934 में शुरू हुई फैक्ट्री, दशकों पुराने कचरे पर उठे सवाल
याचिका के अनुसार, ब्रिटिश कंपनी टर्नर एंड न्यूऑल पीएलसी ने वर्ष 1934 में कैमोर में एस्बेस्टस फैक्ट्री स्थापित की थी। आरोप है कि फैक्ट्री से निकलने वाले खतरनाक कचरे का वर्षों तक आसपास के इलाकों में निस्तारण किया गया। इसके चलते आवासीय क्षेत्रों और सार्वजनिक स्थानों पर भी एस्बेस्टस युक्त कचरा होने की आशंका है।
एस्बेस्टस एक रेशेदार खनिज है, जिसके बेहद बारीक रेशे सांस के जरिए शरीर में पहुंच सकते हैं। लंबे समय तक इसके संपर्क में रहने से फेफड़ों से जुड़ी गंभीर बीमारियों का खतरा बढ़ता है। एस्बेस्टोसिस, फेफड़ों का कैंसर और मेसोथेलियोमा जैसी बीमारियां भी इससे जुड़ी हैं। याचिकाकर्ताओं की चिंता है कि यदि प्रदूषण फैक्ट्री परिसर के बाहर तक फैला है तो आसपास रहने वाले परिवार और बच्चे भी इसके संपर्क में आ सकते हैं।
कनाडाई संस्था की रिपोर्ट का हवाला, 5.65 लाख वर्ग मीटर क्षेत्र पर सवाल
याचिका में कनाडा की पर्यावरणीय संस्था ECOH की रिपोर्ट सहित अन्य अध्ययनों का हवाला दिया गया है। इनके आधार पर कैमोर के आसपास लगभग 10 लाख टन सतही मिट्टी के एस्बेस्टस से दूषित होने का अनुमान बताया गया है। विभिन्न रिपोर्टों में करीब 5 लाख 65 हजार वर्ग मीटर क्षेत्र में प्रदूषण की आशंका भी जताई गई है।
हालांकि, ये आंकड़े याचिका में प्रस्तुत रिपोर्टों और अनुमानों पर आधारित हैं। पूरे क्षेत्र में प्रदूषण की वास्तविक मात्रा और उसके फैलाव की स्वतंत्र वैज्ञानिक जांच कराने की मांग की गई है।
मेडिकल रिकॉर्ड भी याचिका में पेश, प्रभावित लोगों की जांच की मांग
याचिकाकर्ताओं ने वर्ष 2013 से आयोजित चिकित्सा शिविरों, जांच रिपोर्टों और मरीजों के मेडिकल रिकॉर्ड का भी उल्लेख किया है। उनका दावा है कि कैमोर में एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारियों से प्रभावित लोगों की पहचान हुई है और सैकड़ों लोगों के मेडिकल रिकॉर्ड तथा मुआवजे से संबंधित दस्तावेज उपलब्ध हैं।
इन्हीं दस्तावेजों के आधार पर प्रभावित लोगों की स्वतंत्र मेडिकल जांच कराने की मांग की गई है। याचिका में कहा गया है कि स्थानीय निवासियों और फैक्ट्री के पूर्व कर्मचारियों की व्यापक स्वास्थ्य जांच होनी चाहिए। जिन लोगों में एस्बेस्टस से जुड़ी बीमारियों की पुष्टि होती है, उन्हें उचित इलाज, पुनर्वास और कानून के अनुसार मुआवजा दिया जाए।
फैक्ट्री का मालिक बदला, पुराने प्रदूषण की जिम्मेदारी किसकी?
इस मामले में फैक्ट्री के बदलते स्वामित्व का मुद्दा भी उठाया गया है। याचिका में ब्रिटिश कंपनी टर्नर एंड न्यूऑल पीएलसी और बेल्जियम की कंपनी ईटेक्स से जुड़ी पुरानी औद्योगिक गतिविधियों का उल्लेख है। साथ ही बताया गया है कि वर्तमान में फैक्ट्री एवरेस्ट इंडस्ट्रीज लिमिटेड के स्वामित्व में संचालित हो रही है।
याचिकाकर्ताओं ने सवाल उठाया है कि यदि दशकों पुराने औद्योगिक कचरे से प्रदूषण हुआ है तो उसकी सफाई और प्रभावित लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी किसकी होगी। उनकी मांग है कि संबंधित कंपनियों और संस्थाओं की कानूनी जिम्मेदारी तय करने के लिए निष्पक्ष जांच कराई जाए।
हाईकोर्ट से क्या मांग की गई?
जनहित याचिका में कैमोर और आसपास के क्षेत्रों की मिट्टी, हवा और संभावित रूप से प्रभावित स्थानों की वैज्ञानिक जांच कराने की मांग की गई है। इसके जरिए प्रदूषण का वास्तविक दायरा, कचरे की मात्रा और लोगों के स्वास्थ्य पर मौजूदा खतरे का पता लगाने को कहा गया है।
इसके साथ ही प्रदूषण की पुष्टि होने पर कचरे को सुरक्षित तरीके से हटाने और उसके निस्तारण के लिए समयबद्ध योजना बनाने की मांग भी की गई है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि केवल कचरा हटाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि प्रभावित क्षेत्र को सुरक्षित बनाने और वहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य की निगरानी की व्यवस्था भी जरूरी है।
फिलहाल हाईकोर्ट ने केंद्र और राज्य सरकार सहित संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है। प्रदूषण की वास्तविक स्थिति, उसकी मात्रा और इसके लिए जिम्मेदार संस्थाओं के संबंध में अभी न्यायालय का अंतिम फैसला नहीं आया है। आगे की सुनवाई में संबंधित पक्षों के जवाब और जांच से जुड़े दस्तावेज महत्वपूर्ण होंगे।

