बुरी नजर नहीं, आपके कर्म हैं जिम्मेदार! प्रेमानंद महाराज ने तोड़ा सबसे बड़ा भ्रम

काम बिगड़ने, बीमारी आने या अचानक परेशानियां बढ़ने पर लोग अक्सर ‘बुरी नजर’ को जिम्मेदार ठहरा देते हैं। वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज ने इस आम धारणा पर गहराई से बात करते हुए बताया कि नजर नहीं, बल्कि इंसान के अपने कर्म ही उसके सुख-दुख का कारण होते हैं।
प्रेमानंद महाराज

हमारे जीवन में जब अचानक सब कुछ उल्टा होने लगता है, बना-बनाया काम बिगड़ जाता है या बिना वजह परेशानी बढ़ जाती है, तो सबसे पहले मन में यही ख्याल आता है कि शायद किसी की बुरी नजर लग गई है। यह सोच गांवों से लेकर शहरों तक, हर समाज में गहराई से बैठी हुई है। डर, चिंता और असमंजस के बीच इंसान अपने हालात का कारण किसी और की नजर में खोजने लगता है। इसी मानसिक उलझन को वृंदावन के प्रसिद्ध संत प्रेमानंद महाराज ने अपने सत्संग में बेहद सरल शब्दों में सुलझाया है। उन्होंने साफ कहा कि जीवन में घटने वाली हर घटना के पीछे बुरी नजर नहीं, बल्कि हमारे अपने कर्म जिम्मेदार होते हैं।

क्यों जुड़ा है ‘बुरी नजर’ का डर

वृंदावन के संत प्रेमानंद महाराज अपने सहज, सीधे और दिल को छू लेने वाले प्रवचनों के लिए जाने जाते हैं। उनके सत्संगों में अक्सर ऐसे सवाल उठते हैं, जो आम इंसान के मन में रोज जन्म लेते हैं। बुरी नजर को लेकर समाज में फैला डर भी उन्हीं सवालों में से एक है।

प्रेमानंद महाराज बताते हैं कि इंसान जब किसी परेशानी का सामना करता है, तो उसे किसी ठोस कारण से जोड़ने के बजाय एक अदृश्य डर का सहारा ले लेता है। ‘नजर लग गई’ कहना आसान होता है, क्योंकि इसमें हमें अपनी जिम्मेदारी नहीं देखनी पड़ती। लेकिन यही सोच धीरे-धीरे हमारे मन को कमजोर बना देती है और आत्मविश्वास को खा जाती है।

भक्त का सवाल और प्रेमानंद महाराज का सीधा जवाब

हाल ही में एक सत्संग के दौरान एक भक्त ने प्रेमानंद महाराज से सीधा सवाल किया। भक्त ने कहा कि गांव और शहर, दोनों जगह लोग मानते हैं कि बीमारी, धन की हानि या काम में रुकावट बुरी नजर से होती है। उसने पूछा, क्या सच में किसी की नजर हमारे जीवन को बिगाड़ सकती है?

इस सवाल पर प्रेमानंद महाराज मुस्कुराए और बेहद शांत स्वर में उत्तर दिया। उन्होंने कहा कि इंसान के जीवन में जो कुछ भी घटित होता है, वह उसके अपने कर्मों का परिणाम होता है। चाहे वह सुख हो या दुख, सफलता हो या असफलता सबका बीज हमारे कर्मों में छिपा होता है।

नजर नहीं, कर्मों का फल है असफलता

प्रेमानंद महाराज के अनुसार, जब हम असफल होते हैं, तो बुरी नजर का बहाना बनाकर हम अपने कर्मों से मुंह मोड़ लेते हैं। यह एक तरह से खुद को धोखा देना है। इंसान अगर ईमानदारी से अपने काम, सोच और व्यवहार को देखे, तो उसे अपनी परेशानी का कारण खुद ही समझ में आने लगेगा।

महाराज कहते हैं कि पुराने कर्म वर्तमान जीवन में फल देते हैं और वर्तमान कर्म भविष्य का रास्ता तय करते हैं। अगर हम आज आलस, गलत सोच या अधूरी मेहनत करते हैं, तो उसका असर कल जरूर दिखेगा। लेकिन जब परिणाम सामने आता है, तो हम उसे कर्मों की जगह नजर का नाम दे देते हैं।

उन्होंने यह भी कहा कि ईश्वर का नाम एक ऐसा कवच है जिसे कोई नजर भेद नहीं सकती। जब भी घर से बाहर निकलें, प्रभु का स्मरण करें। मन में शांति और विश्वास रखें। ईश्वर से जुड़ा मन खुद-ब-खुद नकारात्मकता से दूर हो जाता है।

Bhawna Choubey
लेखक के बारे में
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