भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष के साईं रेड्डी ने भारत सरकार की पेट्रोल में इथेनॉल मिश्रण की नीति का समर्थन किया है। उनका कहना है कि सरकार के इस कदम से किसानों को फायदा होने वाला है। इसके उपयोग से प्रदूषण कम होगा और रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
रेड्डी ने मुख्यमंत्री डॉ मोहन यादव से हुई मुलाकात के दौरान राज्य के बारे में की गई चर्चा का जिक्र किया। उन्होंने यह भी बताया कि मुरैना में शुगर फैक्ट्री का निरीक्षण किया है, जो दो साल में शुरू हो जाएगी। इसके अलावा उन्होंने मध्य प्रदेश में 20 नई फैक्ट्री आने की संभावना भी जताई।
इथेनॉल पेट्रोल को भारतीय किसान संघ का समर्थन
भारतीय किसान संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष द्वारा केंद्र सरकार की इथेनॉल मिश्रण पेट्रोल की नीति का समर्थन करने से यह साफ हो गया है कि सरकार को किसानों का साथ मिल सकता है। रेड्डी के मुताबिक पेट्रोल में इथेनॉल मिलने के बाद कार्बन का उत्सर्जन कम होगा जिससे पर्यावरण प्रदूषण भी कम होगा। उन्होंने ब्राजील का जिक्र करते हुए बताया कि वहां के पेट्रोल में 30% तक इथेनॉल का उपयोग किया जाता है। भारत भी इस क्षेत्र में आगे बढ़ रहा है।
किसानों को कैसे होगा फायदा?
रेड्डी द्वारा दी गई जानकारी के मुताबिक शुगर फैक्ट्री में उपयोग होने वाले गन्ने के रस के माध्यम से 100% इथेनॉल तैयार किया जा सकता है। मध्य प्रदेश में 20 नई फैक्ट्री आने की संभावना है। ऐसे में अगर इन फैक्ट्री के माध्यम से इथेनॉल का उत्पादन किया जाता है। तो किसानों को अपनी फसल के लिए बाजार मिलेगा और हजारों युवाओं को रोजगार के अवसर प्राप्त होंगे।
इथेनॉल का विरोध, किसान का विरोध: रेड्डी
उन्होंने यह भी कहा है कि इसलिए कुछ दिनों से देश में किसान विरोध का नारा चल रहा है, जो बहुत गलत है। गन्ना, चावल, मक्का सभी से इथेनॉल बन सकता है। इससे किसानों को फायदा होगा। ऐसे में इथेनॉल का विरोध करना किसानों के हितों के विरोध करने के बराबर है। उन्होंने कहा कि केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी भविष्य में 100% इथेनॉल आधारित ईंधन आने की बात बोल चुके हैं। अटल बिहारी वाजपेई ने भी 2005 में 5% इथेनॉल मिलने का निर्णय लिया था।
2 साल में शुरू होगी मुरैना फैक्ट्री
रेड्डी ने बताया कि मुरैना में साल 2008 से शुगर फैक्ट्री बंद पड़ी है। इसका निरीक्षण किया है और अगले 2 साल में इसके दोबारा शुरू होने की उम्मीद है। उन्होंने यह भी बताया कि किसानों का मत है कि शुगर फैक्ट्री को कोऑपरेटिव यानी सहकारी मॉडल पर चलाना चाहिए ना कि MSME या प्राइवेट सेक्टर के जरिए।
जितेंद्र यादव की रिपोर्ट।






