
हाल ही में केंद्र सरकार द्वारा ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 लाया गया था। राज्यसभा और लोकसभा में पास होने के बाद इसे राष्ट्रपति की भी मंजूरी मिल गई, जिसके चलते अब यह बिल कानून बन चुका है। लेकिन इसे लेकर अभी भी विवाद खत्म नहीं हो रहे हैं। दरअसल, रीवा की क्लबूबम 11 स्पोर्ट्स एंड एंटरटेनमेंट प्राइवेट लिमिटेड के सीईओ पुष्पेंद्र सिंह ने अब केंद्र सरकार के ऑनलाइन गेमिंग एक्ट 2025 को चुनौती देते हुए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में एक याचिका दायर की है। इसी याचिका के द्वारा उनका कहना है कि यह कानून युवाओं के मौलिक अधिकारों का हनन करता है और फैंटेसी स्पोर्ट्स जैसे कौशल-आधारित खेलों को भी अवैध बता रहा है। अब इस मामले पर चीफ जस्टिस की डिवीजन बेंच ने सुनवाई अगले हफ्ते करने का फैसला लिया है।
दरअसल, याचिका में पुष्पेंद्र सिंह ने तर्क दिया है कि सुप्रीम कोर्ट और कई हाई कोर्ट पहले ही फैंटेसी स्पोर्ट्स को कौशल-आधारित खेल बता चुके हैं। ऐसे में जब केंद्र सरकार द्वारा यह बिल लाया गया और कानून बनाया गया, तो यह नया ऑनलाइन गेमिंग कानून उस अंतर को खत्म करता है और पूरे सेक्टर को अवैध बताने की कोशिश कर रहा है। कंपनी का कहना है कि यह न केवल संविधान का उल्लंघन है, बल्कि युवाओं के मौलिक अधिकारों को भी छीन रहा है।
क्यों बनाया गया यह कानून?
जानकारी के लिए बता दें कि ऑनलाइन गेमिंग बिल 2025 को 20 अगस्त को लोकसभा में पेश किया गया था, जबकि 21 अगस्त को राज्यसभा में पास किया गया और 22 अगस्त को राष्ट्रपति की मंजूरी मिल गई, जिसके चलते यह कानून बन गया। सरकार द्वारा दावा किया गया कि इस कानून का मकसद युवाओं को लत से बचाना और अवैध सट्टेबाजी को रोकना है। सरकार द्वारा कई तरह की गेमिंग एप्स पर रोक लगाई गई और कई नियम बनाए गए। साथ ही खिलाड़ियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की भी बात कही गई। लेकिन अब गेमिंग इंडस्ट्री का मानना है कि इस कानून से करोड़ों का बाजार प्रभावित होगा और हजारों लोगों की नौकरियां भी दांव पर लग सकती हैं। गेमिंग कंपनियों का तर्क है कि अगर इस कानून को लागू किया गया, तो ई-स्पोर्ट्स और कौशल-आधारित गेम्स भी प्रभावित होंगे।
याचिका में क्या कहा गया?
वहीं, इस याचिका में रीवा के पुष्पेंद्र सिंह की ओर से कहा गया है कि यह कानून मौलिक अधिकारों के खिलाफ है और स्वतंत्रता खत्म करता है। शुक्रवार को चीफ जस्टिस संजीव सचदेवा और विनय सराफ की डिवीजन बेंच ने इस मामले पर सुनवाई करते हुए केस को अगले सप्ताह के लिए सूचीबद्ध कर दिया है। अब अदालत में यह देखना दिलचस्प रहेगा कि क्या वास्तव में यह कानून संविधान और मौलिक अधिकारों के खिलाफ बताया जाएगा या फिर सरकार का कदम युवाओं के हित में माना जाएगा। अब इस मामले पर देशभर की ऑनलाइन गेमिंग इंडस्ट्री की नजर टिकी हुई है।
4 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव.

