
— सुरेन्द्र शर्मा
भारत एक लोकतांत्रिक देश है और हम गर्व से कह सकते हैं कि दुनिया का सबसे मजबूत लोकतंत्र अगर किसी देश में है तो वह भारत देश है।
26 जनबरी 1950 को संविधान लागू होने से लेकर आज तक भारत ने अपनी मजबूत लोकतांत्रिक व्यवस्था का परिचय दुनिया को दिया है हालांकि 1975 में आपातकाल लगाकर इस देश के लोकतंत्र को कुचलने की एक असफल कोशिश भी हुई लेकिन भारतीय जनमानस के दवाब के आगे तानाशाही को झुकना पड़ा और भारत की लोकतंत्र प्रणाली चिरंजीवी रही।
आपातकाल के दौरान विपक्ष के तमाम बड़े नेताओं को जेल में बंद कर दिया गया,प्रेस पर सेंसरशिप लगा दी गई, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे सभी संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया, विपक्ष के लाखों कार्यकर्ताओं को जेल में ठूंस दिया गया “रौलेट एक्ट” की तरह ही “मीसा” maitanance of internal security ACT कानून के अंतर्गत न अपील न वकील न दलील सरकार को जो मन ने नहीं भाया उसे पकड़ कर जेल में बंद कर दिया गया।
देश की जनता ने आपतकाल और तानाशाही का विरोध लोकतांत्रिक तरीके से किया लेकिन भारत की सरकार को हटाने के लिये विदेश से मदद नहीं मांगी।
आज विपक्ष में कांग्रेस पार्टी का साथ दे रही पार्टियां या उनके नेता अधिकाशं जेल में थे चाहे वह वामपंथी पार्टियां हों या समाजवादी पार्टी ।
लोकतंत्र केवल सरकार चुनने की व्यवस्था नहीं, बल्कि स्वतंत्रता, समानता, न्याय और नागरिक जिम्मेदारी पर आधारित जीवन पद्धति है। इसकी शक्ति संविधान, जनभागीदारी और संस्थाओं की विश्वसनीयता से बनती है। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में लोकतंत्र हमारी एकता का महत्वपूर्ण आधार है। अनेक भाषाओं, आस्थाओं और विचारों के बीच संवाद की संभावना हमें लोकतांत्रिक व्यवस्था प्रदान करती है। इसलिए “लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ” का आह्वान प्रत्येक नागरिक को अपने अधिकारों के साथ अपने कर्तव्यों के प्रति सजग करने का संकल्प है।
लोकतंत्र में असहमति का सम्मान आवश्यक है। सरकार की नीतियों पर प्रश्न उठाना, प्रशासन की कमियाँ सामने लाना और जनहित के मुद्दों पर शांतिपूर्ण आंदोलन करना लोकतांत्रिक चेतना के संकेत हैं। कोई व्यवस्था तभी बेहतर होती है, जब उसमें आलोचना सुनने और भूल सुधारने की क्षमता हो। लेकिन विरोध के दौरान हिंसा, आगजनी, धमकी और सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुँचाना स्वीकार नहीं किया जा सकता। जरा विचार कीजिये कि प्रदर्शन भारत के अन्दर हो और प्रदर्शन करने वाले बांग्ला देश को धन्यवाद दें तो यह लोग किस किस्म के लोग होंगे उनका यह कृत्य देश की संप्रभुता के लिये खतरा है या नहीं।

लोकतांत्रिक अधिकारों का प्रयोग करते हुए दूसरों के जीवन, स्वतंत्रता और सुरक्षा का सम्मान करना भी उतना ही आवश्यक है। अराजकता का सबसे अधिक नुकसान सामान्य नागरिक को उठाना पड़ता है। सड़क पर हिंसा होती है तो मजदूर की दिहाड़ी छिनती है, दुकानदार का कारोबार बंद होता है और विद्यार्थी की पढ़ाई प्रभावित होती है। रास्ता बाधित होने पर किसी मरीज को अस्पताल पहुँचने में कठिनाई हो सकती है। सार्वजनिक बस, विद्यालय या अस्पताल को नुकसान पहुँचाना अंततः जनता के संसाधनों को नष्ट करना है। जिन लोगों के हित में आंदोलन करने का दावा किया जाता है, यदि उन्हीं का जीवन संकट में पड़ जाए तो आंदोलन की दिशा पर विचार करना आवश्यक हो जाता है।
विगत दिनों दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शनकारियों ने दिल्ली पुलिस के एक जवान पर चाकू से हमला कर दिया ईश्वर की कृपा रही कि जनहानि नहीं हुई लेकिन सवाल यह है कि आखिर प्रदर्शन कारी प्रदर्शन के दौरान चाकू लेकर क्या करने आये थे।
12 अक्टूबर 2026 को उच्चतम न्यायालय के बाहर इंडिया ब्लॉक के प्रदर्शन के दौरान “वन इंडिया” चैनल की महिला पत्रकार ऋचा पाराशर जो कि गर्भवती भी थी के साथ कांग्रेस नेता और भारत के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी एवं उनके सुरक्षा कर्मियों के द्वारा धक्का मुक्की की गई यह कांग्रेस पार्टी और इंडिया गंठबंधन की अराजक मानसिकता को दर्शाने के लिये पर्याप्त है। महिला पत्रकार से क्षमा याचना के स्थान पर कांग्रेस नेताओं ने के द्वारा यह कुतर्क अवश्य दिया गया कि गर्भवती थीं तो प्रदर्शन का कवरेज करने क्यों आई। जिस देश में नारी को सदैव पूजनीय माना गया है (यत्र नारियस्तु पूज्यंते , रमंते तत्र देवता 🙂 वहाँ महिला का इस प्रकार का अपमान यह अराजकता नहीं तो और क्या है।
संविधान हमें मतभेदों के समाधान के लिए अनेक मार्ग देता है। संसद और विधानसभाएँ बहस के मंच हैं, न्यायालय न्याय प्राप्त करने का माध्यम हैं और चुनाव जनादेश बदलने का अवसर प्रदान करते हैं। इनके अतिरिक्त शिकायत, जनसुनवाई, सूचना प्राप्त करने और शांतिपूर्ण सार्वजनिक अभियान चलाने के रास्ते उपलब्ध हैं। लोकतंत्र की मजबूती इन प्रक्रियाओं का प्रभावी उपयोग करने में है।
लेकिन दुर्भाग्यवश भारत के विपक्ष को न संसद पर भरोसा है न संवैधानिक संस्थाओ पर और न ही न्यायालय पर
अगर इनके अनुकूल कोई निर्णय होता है तो इनके लिया अच्छा लगता है लेकिन अगर इनकी इच्छाओं के विपरीत कोई निर्णय आ जाए तो यह संवैधानिक संस्थाओं पर आरोप लगाने से भी नहीं चूकते अनेक बार अनेक बार नियम कानून को ताक पर यह अपनी मर्यादा भी लांघ जाते है अपनी बात मनवाने के लिए भय और हिंसा का सहारा लेना समाज में अविश्वास बढ़ाता है तथा संवाद की जगह संघर्ष को स्थायी बना देता है।
भारत के नेता प्रतिपक्ष जो कांग्रेस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं उनकी लोकतंत्र के प्रति गैर जिम्मेदारी दर्शाने के लिये उनकी संसद में उपस्थिति को जानना आवश्यक है
15वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति करीब 43% रही थी। 16वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति लगभग 52% दर्ज की गई थी। 17वीं लोकसभा में उनकी उपस्थिति लगभग 51% रही थी (जबकि राष्ट्रीय औसत करीब 67% से 79% के बीच रहा है)।
विपक्ष का लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास और उनकी जवाबदेही साथ-साथ चलनी चाहिए। किसी संस्था के निर्णय से असहमति होने पर उसके कारणों की समीक्षा की जा सकती है और उपलब्ध प्रक्रिया के अनुसार चुनौती भी दी जा सकती है। बिना प्रमाण आरोप लगाकर प्रत्येक संस्था को अविश्वसनीय बताने की विपक्ष की आदत बन चुकी है विपक्ष को इस आदत से बचना चाहिए। संस्थाओं का सम्मान उनके काम पर प्रश्न पूछने से समाप्त नहीं होता; जिम्मेदार प्रश्न और तथ्यपूर्ण उत्तर उनकी विश्वसनीयता को मजबूत करते हैं।

चुनाव लोकतंत्र में जनता के निर्णय का महत्वपूर्ण माध्यम हैं। चुनावी प्रतिस्पर्धा में विचारों, नीतियों और कार्यों की तुलना होनी चाहिए। विजय मिलने पर विनम्रता और पराजय होने पर आत्मचिंतन राजनीतिक परिपक्वता का परिचायक है। चुनाव प्रक्रिया में वास्तविक त्रुटि या अनियमितता की शिकायत हो तो प्रमाण प्रस्तुत किए जाएँ और उचित मंच पर समाधान माँगा जाए। जनता के मत का सम्मान करते हुए व्यवस्था में सुधार करना आवश्यक है। मतदाता को सम्मानजनक भागीदार मानना चाहिए, जिसे अपनी समझ से निर्णय लेने की स्वतंत्रता है।
लेकिन वर्तमान में भारत का विपक्ष अपनी कमियों को दूर करने के स्थान पर हार के बहाने ढूंढता है कभी ईवीएम को दोषी ठहराता है तो कभी निर्वाचन आयोग को ,विपक्ष ने कभी अपनी नीतियों की समीक्षा नहीं की कभी नेतृत्व की समीक्षा नहीं की जब इन दोनों की समीक्षा नहीं होगी तो कांग्रेस जैसी 125 साल पुरानी पार्टी की केन्द्र एवं राज्यों के 99 चुनावों में लगातार पराजय पर आश्चर्य नही होना चाहिये।
विपक्ष की भूमिका लोकतंत्र में अत्यंत महत्वपूर्ण है। वह सरकार की कमियों को सामने लाता है, जनसमस्याओं को आवाज देता है और वैकल्पिक नीतियाँ प्रस्तुत करता है। प्रभावी विपक्ष लोकतंत्र की शक्ति है। इस भूमिका का निर्वहन तथ्यों, तैयारी और जनसंपर्क से होना चाहिए। संसद में गंभीर चर्चा, समितियों में सक्रिय भागीदारी और जनता के बीच रचनात्मक अभियान अधिक स्थायी परिणाम दे सकते हैं। राजनीतिक विरोध इतना कटु नहीं भी होना चाहिए कि सहयोग की प्रत्येक संभावना समाप्त हो जाए। राष्ट्रहित के विषयों पर आवश्यक सहमति बनाने की क्षमता बनी रहनी चाहिए।
यहां भारत के प्रधानमंत्री श्री पी व्ही नरसिम्हा राव एवं तत्कालीन नेता प्रतिपक्ष की भूमिका का उल्लेख करना अति आवश्यक है।
अटल बिहारी वाजपेयी ने नेता प्रतिपक्ष (विपक्ष के नेता) के रूप में वर्ष 1994 में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग (UN Human Rights Commission) के जिनेवा सत्र में भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया था। तत्कालीन प्रधानमंत्री पी.वी. नरसिम्हा राव ने विपक्ष में होने के बावजूद उन्हें इस महत्वपूर्ण कूटनीतिक जिम्मेदारी के तहत जिनेवा भेजा था, ताकि पाकिस्तान द्वारा कश्मीर के मुद्दे पर लाए गए प्रस्ताव का कड़ा मुकाबला किया जा सके और अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की सर्वदलीय एकता का संदेश दिया जा सके।
जब अटल जी से विदेशी पत्रकारों ने पूछा कि आप तो विपक्ष के नेता हैं आप सरकार का पक्ष रख रहे हैं तब अटल जी ने जवाब दिया में अपने देश का पक्ष रख रहा रहा हूं और सरकार भी मेरे देश की है में नेता प्रतिपक्ष की मानसिकता को अपने कमरे में खूंटी पर टांग आया हूं।
“मेरे लिये देश पहले है और दल उसके बाद आता है।”
दुर्भाग्य से भारत का वर्तमान विपक्ष अपनी इस भूमिका में असफल साबित हो रहा है।
आज डिजिटल माध्यमों ने लोकतांत्रिक संवाद को व्यापक बनाया है। सामान्य नागरिक भी अपनी बात बड़ी संख्या में लोगों तक पहुँचा सकता है। लेकिन झूठी खबरें, पुराने वीडियो, अधूरे बयान और भड़काऊ संदेश समाज में तनाव पैदा कर सकते हैं। किसी सूचना को साझा करने से पहले उसका स्रोत और संदर्भ जाँचना जरूरी है। राजनीतिक लाभ के लिए भ्रम फैलाना सार्वजनिक विश्वास को नुकसान पहुँचाता है। जिम्मेदार नागरिक वही है जो अपनी पसंद के पक्ष में आने वाली सूचना की भी सत्यता जाँचे और गलती होने पर उसे सुधारने का साहस रखे।
भारत वर्तमान में दुनिया का सबसे युवा देश है।
भारत में 15 से 29 वर्ष की आयु वर्ग के युवाओं की संख्या लगभग 38 करोड़ है , जो देश की कुल आबादी का करीब 27% है। विभिन्न सरकारी और अंतर्राष्ट्रीय आंकड़ों के अनुसार भारत में युवा आबादी से जुड़े प्रमुख तथ्य इस प्रकार हैं , भारत की लगभग 65 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम उम्र की है (जो लगभग 90 करोड़ के आसपास है)। देश की लगभग 50 प्रतिशत आबादी 25 वर्ष से कम उम्र की है। भारत की युवाओ की औसत आयु लगभग 29 वर्ष है, जिससे यह दुनिया के सबसे युवा देशों में गिना जाता है।
इन युवाओं की ऊर्जा लोकतंत्र को नई दिशा दे सकती है। उन्हें अध्ययन, संवाद, सामाजिक सेवा और स्थानीय समस्याओं के समाधान से जोड़ना चाहिए। स्वच्छता, शिक्षा, पर्यावरण, रक्तदान और जरूरतमंदों की सहायता जैसे कार्य समाज में सहयोग बढ़ाते हैं। राजनीतिक संगठनों को युवाओं को प्रश्न पूछने, नेतृत्व विकसित करने और सार्वजनिक जीवन की मर्यादाएँ सीखने का अवसर देना चाहिए। नारे लगाने के साथ समस्याओं को समझना और व्यावहारिक समाधान सुझाना भी आवश्यक है। विवेक तथा संवेदनशीलता से युक्त युवा शक्ति राष्ट्रनिर्माण का मजबूत आधार बन सकती है लेकिन जब इन युवाओं के बीच में जाकर “टुकड़े टुकड़े गैंग” भारत तेरे टुकड़े होंगे इंशा अल्लाह इंशा अल्लाह के नारे लगाते हैं और राहुल गाँधी ऐसे लोगों का समर्थन करते हैं तो अराजक स्थिति बनती है।
20 जुलाई को दिल्ली के जंतर मंतर के प्रदर्शन के के बाद कॉकरोच पार्टी प्रदर्शन कारियों के द्वारा पुलिस पर पथराव होना अराजकता नहीं तो और क्या है।
वो कौन सी ताकते हैं जो छात्रों के हाथों में किताब कलम और कम्पूटर के स्थान पर पत्थर थमा देना चाहते हैं।
कौन हैं जो देश के युवाओं का आदर्श कलाम के स्थान पर कसाव बना देना चाहते हैं।
स्वामी विवेकानंद इस देश की युवा तरुनाई के आदर्श थे हैं और रहेंगे कोई भी ताकत इन्हें अराजक नहीं बना सकती है तात्कालिक किसी के प्रयास भले ही सफ़ल हो जाएं पर भारत माता के बेटों के लिये सदैव देश प्रथम ही रहेगा।।
सामाजिक सद्भाव लोकतांत्रिक स्थिरता की आवश्यक शर्त है। जाति, धर्म, भाषा या क्षेत्र के आधार पर किसी समुदाय के विरुद्ध घृणा फैलाना राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है।
आज जब में यह लेख लिख रहा हूँ तो 1984 के सिख दंगों की शुरुआत की बरसी भी है।
31 अक्टूबर 19840को प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी जी की हत्या के बाद सारे देश में दंगे भड़क उठे जो कई दिन तक चले। सारे देश में जगह जगह सिखों का कत्लेआम हुआ।
तब के प्रधानमंत्री राजीव गाँधी ने दंगों पर अपनी प्रतिक्रिया में कहा ” जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती है”। सरकारी आंकड़ों के अनुसार मरने वालों की संख्या 3350 है जबकि स्वयंसेवी संगठनों ने इसे 30000 तक बताया है।
इन दंगों में कांग्रेस नेता सज्जन कुमार को सजा हुई एवं जगदीश टाइटलर पर न्यायालय में मामला चल रहा है। अपराध की जिम्मेदारी संबंधित व्यक्ति की होती है; उसके लिए पूरे समुदाय को दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए। प्रत्येक भारतीय की सुरक्षा और सम्मान समान महत्व रखते हैं। मतभेदों के बावजूद पड़ोसी, सहकर्मी और सहनागरिक के रूप में हमारा संबंध बना रहता है। इसी संबंध को बचाए रखने के लिए संयमित भाषा और परस्पर सम्मान जरूरी हैं।
“लोकतंत्र बचाओ, अराजकता हटाओ” को व्यवहार में उतारने की शुरुआत भी इस देश के नागरिकों को स्वयं से करनी होगी, हम मतदान करें, कानून का पालन करें, सार्वजनिक संपत्ति की रक्षा करें और अन्याय के विरुद्ध शांतिपूर्वक आवाज उठाएँ। राजनीतिक नेतृत्व अपने आचरण से उदाहरण प्रस्तुत करे तथा प्रशासन शिकायतों को गंभीरता से सुने। अधिकारों की रक्षा और कर्तव्यों का निर्वहन मिलकर लोकतंत्र को सुरक्षित बनाते हैं। आइए, ऐसा सार्वजनिक वातावरण बनाएँ जहाँ बहस निर्भय होकर हो, विरोध शांतिपूर्ण हो, निर्णय जवाबदेह हों और हर नागरिक संविधान के संरक्षण में सम्मानपूर्वक जीवन जी सके।
जब भारत में विपक्ष के नेता विशेषकर कांग्रेस पार्टी के नेता लोकतंत्र की बात करते हैं बड़ा हास्यास्पद लगता,देश में केन्द्र की कांग्रेस सरकारों द्वारा किस प्रकार से लोकतंत्र का गला घोंटा गया उसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हँ।
भारत में संविधान के अनुच्छेद 356 (राष्ट्रपति शासन) का उपयोग करके अब तक लगभग 90 बार राज्य सरकारों को बर्खास्त किया गया है। राजनीतिक और आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, विभिन्न प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में राज्य सरकारों को बर्खास्त करने का विवरण इस प्रकार रहा है: जवाहरलाल नेहरू 7 बार ,इंदिरा गांधी 50 बार, राजीव गांधी 6 बार,पी. वी. नरसिम्हा राव 11 बार, मनमोहन सिंह 11 बार जबकि भारतीय जनता पार्टी की सरकार चाहे वह मोरारजी देसाई की सरकार हों,अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार हो या नरेंद्र मोदी
जी की सरकार इनके कार्यकाल में अनुच्छेद 356 के तहत कोई भी चुनी हुई राज्य सरकार बर्खास्त नहीं की गई है। कांग्रेस पार्टी द्वारा विपक्ष की पार्टियों की इतनी बार सरकारें बर्खास्त की गईं पर किसी भी दल ने अराजकता का रास्ता नहीं अपनाया बल्कि लोकतांत्रिक तरीके से अपना विरोध जनता के समक्ष रखा बाद में हुये उन राज्यों के चुनावों में जीत भले ही किसी भी पार्टी की हुई हो लेकिन देश का लोकतंत्र भी साथ में जीता।
वर्तमान में कांग्रेस नेता राहुल गांधी और उनके साथी “इंडिया ब्लॉक “, के नेता SIR को लेकर हाय दैया मचा रहे हैं भारत में SIR पहली बार नहीं हुआ है यह 12 वी बार है जब भारत में SIR की प्रक्रिया हुई है। भारत में मतदाता सूचियों का गहन पुनरीक्षण कई बार हुआ है। SIR अर्थात “विशेष गहन पुनरीक्षण” — Special Intensive Revision है जिन्हें पूर्व ने केवल Intensive Revision कहा गया है। अभियान एक साथ पूरे भारत में कभी नहीं हुआ था अलग अलग राज्यों में अलग समय पर मतदाता सूची का शुद्धिकरण हुआ है। निर्वाचन आयोग के 24 जून 2025 के आदेश में पुराने गहन पुनरीक्षणों के ये वर्ष दर्ज हैं: 1952–56, 1957, 1961, 1965, 1966, 1983–84, 1987–89, 1992, 1993, 1995, 2002, 2003 और 2004 इन वर्षों में 10 बार SIR के समय कांग्रेस की सरकारें थीं जबकि 2004 में भाजपा की अटल बिहारी वाजपेयी जी की सरकार थी एवं वर्तमान में नरेन्द्र मोदी जी की सरकार है। इस दौरान अनेक वरिष्ठ प्रशासनिक अधिकारी निर्वाचन आयुक्त रहे। 1952–1956 में निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन थे और प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू,1957 में भी निर्वाचन आयुक्त सुकुमार सेन ही थे और प्रधानमंत्री भी जवाहरलाल नेहरू जी ही थे।
1961 में निर्वाचन आयुक्त श्री के. वी. के. सुंदरम थे और प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू, 1966 में निर्वाचन आयुक्त श्री के. वी. के. सुंदरम थे और कार्यवाहक प्रधानमंत्री श्री गुलजारीलाल नंदा एवं श्रीमती इंदिरा गाँधी दोनों रहे । 1983–1984 आर. के. त्रिवेदी निर्वाचन आयुक्त थे एवं प्रधानमंत्री श्रीमति इंदिरा गाँधी एवं इंदिरा गांधी जी की हत्या के पश्चात राजीव गांधी भारत के प्रधानमंत्री रहे 1987–1989 श्री आर. वी. एस. पेरी शास्त्री निर्वाचन आयुक्त रहे एवं प्रधानमंत्री राजीव गांधी—2 दिसंबर 1989 तक उसके बाद विश्वनाथ प्रताप सिंह प्रधानमंत्री रहे ।
1992 में टी. एन. शेषन निर्वाचन आयुक्त थे एवं पी. वी. नरसिंह राव,1993 में भी टी. एन. शेषन निर्वाचन आयुक्त एवं पी. वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री 1995 में भी टी. एन. शेषन निर्वाचन आयुक्त एवं पी. वी. नरसिंह राव प्रधानमंत्री थे।
2002 जे. एम. लिंगदोह निर्वाचन आयुक्त एवं अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे
2003 जे. एम. लिंगदोह निर्वाचन आयुक्त एवं अटल बिहारी वाजपेयी जी ही प्रधानमंत्री थे
2004 जे. एम. लिंगदोह—7 फरवरी तक, टी. एस. कृष्णमूर्ति—8 फरवरी से निर्वाचन आयुक्त रहे एवं अटल बिहारी वाजपेयी—22 मई तक; उसके बाद डॉ. मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री रहे।
वर्तमान में वर्ष 2024 में बिहार राज्य में SIR की प्रक्रिया की गई बिहार का SIR 24 जून से 30 सितंबर 2025 तक चला। उस समय मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार, अन्य निर्वाचन आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी, तथा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी थे। बिहार में SIR से पहले मतदाता लगभग 7.89 करोड़ प्रारूप सूची बनाते समय बाहर रहे नाम 65 लाख
प्रारूप के बाद और हटाए गए नाम 3.66 लाख दोनों चरणों में कुल हटाए/बाहर रखे गए नाम 68.66 लाख फॉर्म 6 से जोड़े गए नाम 21.53 लाख
शुद्ध कमी: 68.66 − 21.53 47.13 लाख 30 सितंबर 2025 की अंतिम सूची लगभग 7.42 करोड़ की रही।
इसके साथ ही दिल्ली, मध्यप्रदेश , महाराष्ट्र में भी SIR की प्रक्रिया संपन्न हुई।
“निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के अनुसार भारत में 1950 के दशक से विभिन्न अवधियों में गहन पुनरीक्षण होते रहे हैं। पुराने सभी अभियानों में नाम जुड़ने और हटने के के कार्य हुये हैं परन्तु कभी भी तत्कालीन विपक्ष ने भले ही वह भाजपा हो या कांग्रेस पार्टी ही कभी भी निर्वाचन आयोग पर आरोप नहीं लगाए। वर्तमान में विपक्ष भारत के मुख्य निर्वाचन आयुक्त को जिस प्रकार से निशाना बना रहा है वह निर्वाचन आयोग की भी गरिमा को ठेस पहुंचा रहा है और विपक्ष की भी।।
भारत के विपक्ष को आखिर SIR से इतना परहेज क्यों है क्या भारत की मतदाता सूची में बांग्ला देशी घुसपैठियों को रहना चाहिये ,क्या पाकिस्तानी नागरिकों को रहना चाहिये क्या जो मृत हो गये हैं उन्हें रहना चाहिये क्या एक मतदाता का नाम दो जगह रहना चाहिये अगर इन सभी प्रश्नों का उत्तर न है तो फिर राहुल गाँधी समेत विपक्ष के तमाम नेताओं को देश को जवाब देना चाहिये कि उन्हें SIR प्रक्रिया में दिक्कत क्या है।
विपक्ष के नेताओं से आग्रह है कि वह लोकतंत्र का सम्मान करें, हिंसा और अराजकता का त्याग करें। संवाद, सद्भाव और संविधान के मार्ग पर चलकर देश को आगे बढ़ाएं।।
देश जनता को भी देश को अराजकता में धकेलने के किसी भी प्रयास का पुरजोर विरोध लोकतांत्रिक तरीके से करना चाहिये,लोकतंत्र सुरक्षित रहेगा तो देश सुरक्षित रहेगा।
“लोक तंत्र बचाओ–अराजकता हटाओ” केवल एक नारा नहीं वर्तमान समय में देश की ज़रूरत है।
4 वर्षों का पत्रकारिता अनुभव.

