
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण को लेकर राजनीतिक और सामाजिक टकराव तेज हो गया है। राज्य के वरिष्ठ मंत्री और ओबीसी नेता छगन भुजबल ने साफ कहा है कि मराठा समुदाय को अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के कोटे में शामिल करना गलत होगा। उन्होंने चेतावनी दी कि अगर ओबीसी का हक छीना गया तो लाखों लोग सड़कों पर उतरकर आंदोलन करेंगे। भुजबल ने कहा कि मराठों को अलग से आरक्षण देने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन ओबीसी कोटे में सेंधमारी स्वीकार्य नहीं है। उनका यह बयान उस समय आया है जब मराठा आरक्षण के लिए मनोज जरांगे पाटिल मुंबई के आजाद मैदान में भूख हड़ताल पर बैठे हैं।
फडणवीस के मंत्री भुजबल ने दी चेतावनी
भुजबल ने ओबीसी नेताओं की बैठक के बाद पत्रकारों को बताया कि 27 फीसदी ओबीसी आरक्षण में से 6 फीसदी खानाबदोश जनजातियों और 2 फीसदी गोवारी समाज के लिए तय है। शेष 17 फीसदी आरक्षण ही 374 समुदायों के लिए बचा है। उन्होंने कहा कि मराठों को इसमें शामिल करना नाइंसाफी होगी। भुजबल ने स्पष्ट कहा कि अदालत पहले ही इस मांग को “मूर्खतापूर्ण” बता चुकी है। उन्होंने जोड़ा कि ओबीसी समुदाय पहले से ही सीमित अवसरों के बीच संघर्ष कर रहा है और अगर कोटे में कटौती की गई तो आंदोलन तेज होगा। उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस से भी मुलाकात कर ओबीसी संगठनों की चिंताओं को साझा किया है।
इसी बीच मुंबई उच्च न्यायालय ने सोमवार को सरकार को निर्देश दिया कि वह मंगलवार दोपहर तक दक्षिण मुंबई की सड़कों पर बैठे मराठा आंदोलनकारियों को हटाए। अदालत ने कहा कि आंदोलन करना सभी का अधिकार है, लेकिन यह केवल आजाद मैदान तक सीमित होना चाहिए। पांच हजार से अधिक लोग एकत्र नहीं होने चाहिए और शहर की यातायात व्यवस्था प्रभावित नहीं होनी चाहिए। न्यायालय ने यह भी कहा कि गणेशोत्सव के मौके पर मुंबई की बदनामी नहीं होनी चाहिए। याचिका अधिवक्ता गुणरत्न सदावर्ते ने दायर की थी, जिसमें आंदोलनकारियों द्वारा सड़कें जाम करने की शिकायत की गई थी।
कोर्ट के निर्देश के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि आदेशों का पालन होगा। इसके बाद मनोज जरांगे पाटिल ने भी अपने समर्थकों से अपील की कि वे सड़कों से हट जाएं और कानून व्यवस्था में बाधा न डालें। पाटिल 29 अगस्त से भूख हड़ताल पर बैठे हैं और उनके हजारों समर्थक सीएसएमटी रेलवे स्टेशन और आसपास की सड़कों पर डटे हुए थे। अदालत के हस्तक्षेप के बाद उन्होंने कहा कि वे न्यायपालिका का सम्मान करते हैं और आंदोलन अब शांतिपूर्ण ढंग से केवल आजाद मैदान तक सीमित रहेगा। इस पूरे विवाद ने महाराष्ट्र की राजनीति में ओबीसी और मराठा आरक्षण के मुद्दे को और गरमा दिया है।
