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3 दिसम्बर 1984 गैस त्रासदी : भोपाल की पीढ़ियाँ इस कचरे के साथ जीने को मजबूर थीं… जब डॉ. मोहन यादव ने लिया हिम्मती और संवेदनशीलता भरा कदम

Written by:Gaurav Sharma
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भोपाल गैस त्रासदी को 41 वर्ष पूरे होने पर यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर से दशकों पुराना 337 टन जहरीला कचरा हटाने की प्रक्रिया को गति मिली है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की व्यक्तिगत निगरानी में यह कदम उठाया गया, जिससे वर्षों से लंबित पड़ी इस पर्यावरणीय चुनौती के निपटान की दिशा में एक महत्वपूर्ण चरण पूरा हुआ है।
3 दिसम्बर 1984 गैस त्रासदी : भोपाल की पीढ़ियाँ इस कचरे के साथ जीने को मजबूर थीं… जब डॉ. मोहन यादव ने लिया हिम्मती और संवेदनशीलता भरा कदम

Bhopal Gas Tragedy: देश के सबसे बड़े औद्योगिक हादसों में से एक भोपाल गैस त्रासदी को आज 41 वर्ष पूरे हो गए हैं। इस लंबी अवधि में यूनियन कार्बाइड फैक्ट्री परिसर में पड़ा हजारों टन जहरीला कचरा राज्य और केंद्र सरकारों के लिए एक गंभीर चुनौती बना रहा। हालांकि, इस वर्ष कचरे को हटाने और उसके वैज्ञानिक निपटान की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रगति देखी गई है, जिसने दशकों से अटकी इस प्रक्रिया को आखिरकार गति दी।

वर्ष 1984 में हुई इस त्रासदी के बाद से ही फैक्ट्री परिसर में पड़ा यह खतरनाक अपशिष्ट पर्यावरण और जनजीवन के लिए खतरा बना हुआ था। इसकी सफाई को लेकर कई बार चर्चाएं हुईं और योजनाएं बनीं, लेकिन ठोस कार्रवाई हमेशा अधूरी रह जाती थी। अब मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की व्यक्तिगत निगरानी और स्पष्ट निर्देशों के बाद इस दिशा में तेजी से काम हुआ है।

राज्य सरकार ने इस वर्ष 337 टन ठोस कचरे को प्लांट परिसर से निकालकर सीलबंद कंटेनरों में पीथमपुर भेजा। यह वही जहरीला कचरा था जो 1984 के हादसे के बाद से वहीं पड़ा था। कचरा ले जाने की पूरी प्रक्रिया मुख्यमंत्री के निर्देश पर सुरक्षा और वैज्ञानिक मानकों के अनुसार संपन्न हुई। विभागों को सख्त हिदायत दी गई थी कि पैकिंग, ट्रांसपोर्ट और निगरानी में किसी भी प्रकार की चूक न हो।

मुख्यमंत्री की निगरानी में वैज्ञानिक निपटान

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने इस पूरे अभियान को ‘वैज्ञानिक और सुरक्षित कदम’ बताया था। उन्होंने कहा,

“भोपाल की पीढ़ियाँ इस कचरे के साथ जीने को मजबूर थीं। अब इसे हटाकर आगे की प्रक्रिया पूरी करना नितांत आवश्यक है।”

डॉ. यादव ने यह भी स्पष्ट किया कि राज्य सरकार सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का अक्षरशः पालन करेगी। कचरे का अंतिम निपटान तभी होगा जब अदालत इसकी अनुमति देगी।

पीथमपुर पहुँचने पर स्थानीय विरोध का सामना करना पड़ा था, लेकिन मुख्यमंत्री ने स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा था कि कोई भी कार्य कोर्ट की अनुमति के बिना नहीं होगा। उन्होंने जानकारी दी कि निपटान से पहले ड्राई-रन सफलतापूर्वक किया जा चुका है और उसकी रिपोर्ट सर्वोच्च न्यायालय में प्रस्तुत की गई है। इसी रिपोर्ट के आधार पर अगली प्रक्रिया तय की गई थी। सरकार का रुख वैज्ञानिक और सुरक्षित प्रक्रिया को लेकर लगातार स्पष्ट और संयमित बना रहा।

आगे की चुनौतियाँ और विशेषज्ञों की राय

पर्यावरण विशेषज्ञों का मानना है कि सतही कचरे को हटाना समाधान का केवल पहला चरण है। उनके अनुसार, आगे भी मिट्टी और भूजल शुद्धिकरण की प्रक्रिया अनिवार्य रहेगी। हालांकि, यह भी एक बड़ा तथ्य है कि इस वर्ष कचरा हटाने का यह कार्य तीन दशकों से अधिक समय से बार-बार अटकता रहा था। इस बार मुख्यमंत्री के सीधे निर्देश पर इसे व्यवस्थित तरीके से पूरा किया गया है।

भोपाल गैस त्रासदी के 41 वर्ष पूरे होने पर राज्य सरकार का यह कदम इसलिए अधिक चर्चा में रहा, क्योंकि इसने लंबे समय से रुकी हुई प्रक्रिया को वास्तविक गति प्रदान की। अदालतों में आगे की सुनवाई जारी है, लेकिन इस वर्ष कचरे को हटाने की दिशा में हुई प्रगति को राज्य सरकार एक ‘महत्वपूर्ण चरण’ मान रही है।

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