नई दिल्ली: भारत के पहले पैसिव यूथेनेशिया (निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु) मामले में ऐतिहासिक अनुमति पाने वाले हरीश राणा ने दुनिया को अलविदा कह दिया है। 13 साल से अधिक समय तक कोमा में रहने के बाद दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) में उनका निधन हो गया। सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर उन्हें एम्स में भर्ती कराया गया था, जहां डॉक्टरों की देखरेख में धीरे-धीरे उनका जीवन रक्षक सपोर्ट हटाया गया।
पिछले कई दिनों से उनका न्यूट्रिशनल सपोर्ट रोक दिया गया था। डॉक्टरों की एक टीम लगातार उनकी निगरानी कर रही थी और उन्हें दर्द कम करने वाली दवाएं दी जा रही थीं, ताकि उनकी अंतिम यात्रा शांतिपूर्ण और दर्द रहित हो सके।
सुप्रीम कोर्ट का वह ऐतिहासिक फैसला
यह मामला तब सुर्खियों में आया जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 11 मार्च को एक अभूतपूर्व फैसला सुनाया। गाजियाबाद निवासी हरीश राणा के माता-पिता ने अपने बेटे की पीड़ा को समाप्त करने के लिए अदालत से इच्छा-मृत्यु की गुहार लगाई थी। अदालत ने उनकी याचिका स्वीकार करते हुए हरीश को पैसिव यूथेनेशिया की मंजूरी दी थी। यह भारत में इस तरह का पहला मामला था, जिसने जीवन के अधिकार और सम्मान से मरने के अधिकार पर एक नई बहस छेड़ दी।
“यह बेहद दुःखद रिपोर्ट है। यह हमारे लिए मुश्किल फैसला है। पर हम इस लड़के को यूं अपार दुःख में नहीं रख सकते।”- जस्टिस पारदीवाला, सुप्रीम कोर्ट
अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया था कि पूरी प्रक्रिया पूरी गरिमा के साथ संपन्न हो और इसके लिए हरीश को एम्स के पैलिएटिव केयर में भर्ती करने का आदेश दिया गया था।
कैसे इस हालत में पहुंचे थे हरीश?
हरीश राणा की जिंदगी 2013 में एक झटके में बदल गई। चंडीगढ़ में पढ़ाई कर रहे हरीश अपने हॉस्टल की चौथी मंजिल से गिर गए थे, जिससे उनके सिर में गंभीर चोटें आईं। इस हादसे के बाद से ही वह लगातार अचेत अवस्था में थे और बिस्तर पर थे। 100 फीसदी दिव्यांगता के शिकार हो चुके हरीश के शरीर पर लंबे समय तक एक ही स्थिति में रहने के कारण घाव भी बन गए थे।
एम्स में अंतिम प्रक्रिया
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद, हरीश को 14 मार्च को दिल्ली एम्स में भर्ती कराया गया। मेडिकल टीम ने 15 मार्च को उनकी लिक्विड डाइट बंद कर दी और 17 मार्च से उन्हें पानी देना भी बंद कर दिया गया। लगभग 10 दिनों तक बिना किसी पोषण के, केवल दर्द निवारक दवाओं के सहारे रहने के बाद उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके माता-पिता बेटे के ठीक होने की सारी उम्मीदें खो चुके थे और उन्होंने ही इस दर्दनाक सफर को समाप्त करने के लिए न्याय का दरवाजा खटखटाया था।






